September 16, 2026

जानिए क्यों हो रही नेपाल जलप्रलय की तुलना हिरोशिमा परमाणु विस्फोट से

Hiroshima

काठमांडू : नेपाल के लांगटांग लिरुंग पर्वत से टूटे विशाल ग्लेशियर ने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी में तबाही ला दी है। इस जलप्रलय ने पल भर में 160 लोगों की जान ले ली, जबकि सैकड़ों लोग अब भी मलबे में दबे हैं।

तबाही की शुरुआत और ‘भूकंप’ का भ्रम

26 अगस्त 2026 की सुबह 8:37 बजे काठमांडू से 45 किमी उत्तर में 23,733 फीट ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत का एक विशाल ग्लेशियर टूटकर 4000 फीट नीचे घाटी में गिर गया। आधा किलोमीटर से चौड़े इस टुकड़े के गिरने की ऊर्जा हिरोशिमा परमाणु विस्फोट की 6.3% के बराबर थी। इससे 5.2 तीव्रता का ऐसा कंपन पैदा हुआ कि शुरुआत में अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण (USGS) ने इसे भूकंप मान लिया था।

बर्फ से बनी ‘तरल कंक्रीट’ की खौफनाक सुनामी

ग्लेशियर के ल्हेन्डे खोला नदी में गिरने से पहले एक प्राकृतिक बांध बना, जो बढ़ते दबाव से तुरंत टूट गया। इसके बाद कीचड़, चट्टानों और बर्फ का जो सैलाब निकला, उसे विशेषज्ञों ने ‘लिक्विड कंक्रीट’ का नाम दिया है। 100 फीट ऊंची इस लहर ने रास्ते में आने वाली इमारतों, पुलों और बसों को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पानी की यह दीवार भूकंप जैसी गर्जना के साथ आई और सब कुछ लील गई।

त्रासदी के खौफनाक आंकड़े

इस प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान की स्थिति बेहद गंभीर है:

  • मौतें: अब तक 160 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है और 157 शव बरामद किए गए हैं।

  • लापता: 826 लोग लापता हैं, जिनमें भारत, अमेरिका और ब्रिटेन सहित अन्य देशों के 579 पर्यटक शामिल हैं।

  • बुनियादी ढांचा: रसुवा जिले के 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और 9 बैंक शाखाएं पूरी तरह तबाह हो गई हैं।

  • तीर्थयात्रा प्रभावित: कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों और लांगटांग ट्रेकिंग रूट (स्याब्रुबेसी) के रास्ते पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं।

क्यों ढह रहे हैं हिमालय के पहाड़? संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 30 सालों में नेपाल ने अपनी एक-तिहाई बर्फ खो दी है और ग्लेशियर पिघलने की दर 65% तक बढ़ गई है। ICIMOD के मुताबिक, हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र दुनिया के औसत से कहीं तेजी से गर्म हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग और यूरेशियन प्लेटों के टकराने से हिमालय का भूगर्भीय ढांचा लगातार अस्थिर हो रहा है, जिससे नेपाल में 47 से अधिक ग्लेशियर झीलें ‘टाइम बम’ की तरह फटने की कगार पर हैं।