बागपत की 3 सीटों पर बदले सियासी समीकरण: आरएलडी के एनडीए में आने से छपरौली, बड़ौत और बागपत में सीट बंटवारे की नई चुनौती
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का अहम केंद्र और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि रहे बागपत जिले में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक बिसात बिछने लगी है। जिले की तीन विधानसभा सीटों—छपरौली (50), बड़ौत (51) और बागपत (52)—पर इस बार सियासी समीकरण 2022 के मुकाबले पूरी तरह बदल चुके हैं।
2022 में समाजवादी पार्टी (SP) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाला राष्ट्रीय लोकदल (RLD) अब एनडीए (NDA) का हिस्सा बन चुका है, जबकि दूसरी ओर सपा और कांग्रेस एक साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। इस बदले हुए गठजोड़ के बाद बागपत में मुख्य मुकाबला भाजपा-आरएलडी गठबंधन और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच केंद्रित होता दिख रहा है।
बड़ौत में महज 315 वोटों की जंग, बागपत में भाजपा की बढ़त
2022 के विधानसभा चुनाव में बड़ौत और बागपत सीटों पर बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिला था।
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बड़ौत (51): इस सीट पर जीत-हार का अंतर बेहद मामूली रहा। भाजपा के कृष्णपाल मलिक ने 90,931 वोट (46.34%) हासिल कर आरएलडी के जयवीर सिंह तोमर को महज 315 वोटों से हराया था। जयवीर सिंह तोमर को 90,616 वोट (46.18%) मिले थे, जबकि बसपा के अंकित शर्मा 11,244 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
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बागपत (52): भाजपा के योगेश धामा ने 1,01,420 वोट (47.50%) हासिल कर जीत दर्ज की थी। उन्होंने आरएलडी प्रत्याशी मोहम्मद अहमद हमीद को 6,733 वोटों के अंतर से शिकस्त दी थी। अहमद हमीद को 94,687 वोट (44.34%) और बसपा के अरुण कसाना को 12,863 वोट मिले थे।
छपरौली में आरएलडी का दबदबा, 29 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे अजय कुमार
आरएलडी का पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र मानी जाने वाली छपरौली (50) सीट पर 2022 में गठबंधन के तहत आरएलडी उम्मीदवार ने एकतरफा जीत दर्ज की थी।
आरएलडी के अजय कुमार तोमर ने 1,11,880 वोट (53.30%) पाकर भाजपा के सहेंद्र सिंह रमाला को 29,508 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। सहेंद्र सिंह रमाला को 82,372 वोट मिले थे, जबकि बसपा के साहिक 9,774 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे।
एनडीए के भीतर सीट बंटवारे का पेंच और 2024 के संकेत
2022 में आमने-सामने लड़े भाजपा और आरएलडी के एक साथ आने के बाद 2027 के लिए सीट बंटवारे की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा-आरएलडी गठबंधन को छपरौली और बड़ौत दोनों विधानसभा क्षेत्रों में सपा के मुकाबले बढ़त मिली थी। ऐसे में बड़ौत सीट, जहां भाजपा ने सिर्फ 315 वोटों से जीत दर्ज की थी, और बागपत सीट, जहां भाजपा के मौजूदा विधायक हैं, वहां दोनों दलों के बीच दावेदारी का तालमेल अहम होगा। वहीं छपरौली सीट पर आरएलडी का मजबूत दावा बना हुआ है।
‘व्याघ्रप्रस्थ’ से बागपत तक का सफर और जातीय ताना-बाना
ऐतिहासिक रूप से बागपत को प्राचीन काल में ‘व्याघ्रप्रस्थ’ यानी ‘बाघों की भूमि’ कहा जाता था। मान्यता है कि इस क्षेत्र में कभी बाघों की संख्या अधिक होने के चलते यह नाम पड़ा था। 1857 के विद्रोह के बाद बागपत को तहसील मुख्यालय का दर्जा मिला। यहां की स्थानीय मंडी की स्थापना रुहेला सरदार नजीब खान के बेटे जाबिता खान के समय से जुड़ी मानी जाती है।
राजनीतिक दृष्टि से बागपत में जाट मतदाताओं की बड़ी आबादी है, वहीं मुस्लिम, त्यागी, ब्राह्मण और गुर्जर मतदाता भी चुनावी नतीजों को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। आगामी चुनाव में उम्मीदवारों के चयन और गठबंधन के अंतिम सीट बंटवारे के बाद ही मैदानी मुकाबले की वास्तविक तस्वीर तय होगी।
