जंतर-मंतर को ‘प्रदर्शन स्थल’ से हटाने पर विवाद: दिल्ली पुलिस के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में याचिका
देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची (डी-नोटिफाई) से हटाने के दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार के हालिया फैसले ने एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। पुलिस के इस आदेश के खिलाफ अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) और दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है, जहां इस फैसले को असंवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका: ‘मौलिक अधिकारों का सीधा हनन’
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर एक अधिवक्ता (वकील) की ओर से जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में अदालत से दिल्ली पुलिस के इस विवादित आदेश को तत्काल रद्द करने की गुहार लगाई गई है।
याचिकाकर्ता ने अपने तर्कों में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) का प्रमुखता से हवाला दिया है। याचिका में मजबूती से कहा गया है कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाना नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीके से बिना हथियारों के एकत्र होने (Right to Assemble Peacefully) और अपनी बात रखने की अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech and Expression) जैसे मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि जंतर-मंतर दशकों से आम नागरिकों, किसानों, छात्रों और सिविल सोसाइटी के लिए अपनी आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने का एक अहम और सुरक्षित मंच रहा है। इसे अचानक डी-नोटिफाई करना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कुचलने के समान है।
दिल्ली हाईकोर्ट में इंडियन यूथ कांग्रेस ने दी चुनौती
दूसरी तरफ, इस मामले की गूंज दिल्ली हाईकोर्ट में भी पहुंच गई है। इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब ने हाईकोर्ट में एक अलग याचिका दाखिल कर दिल्ली पुलिस के इस फैसले को कड़ी चुनौती दी है।
चिब ने अपनी याचिका में अदालत से अपील की है कि वह पुलिस के इस आदेश पर तुरंत रोक (Stay) लगाए, ताकि नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर सकें। यूथ कांग्रेस का तर्क है कि सरकार जानबूझकर राजधानी में विरोध प्रदर्शनों की जगह को खत्म कर रही है, ताकि विपक्ष और आम जनता की आवाज को दबाया जा सके। यह याचिका विशेष रूप से हालिया घटनाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जहां चुनाव आयोग और अन्य सरकारी फैसलों के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे युवा नेताओं और छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया था।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
यह कानूनी लड़ाई ऐसे समय में शुरू हुई है जब हाल ही में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और छात्र संगठनों (NSUI, AISA) से जुड़े कई युवाओं को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने और तिरंगा फहराने के आरोप में हिरासत में लिया गया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस ने अपनी कार्रवाई को उचित ठहराते हुए कहा था कि जंतर-मंतर अब प्रदर्शन के लिए अधिकृत जगह नहीं है।
हालांकि, विपक्ष के नेता राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी समेत कई बड़े नेताओं ने जंतर-मंतर को डी-नोटिफाई करने की कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘तानाशाही’ और ‘कायरतापूर्ण कदम’ करार दिया था।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट पर टिकी हैं कि क्या वे नागरिकों के प्रदर्शन के अधिकार को तरजीह देते हुए पुलिस के इस आदेश पर कोई अंतरिम रोक लगाते हैं, या सरकार के सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के तर्कों को स्वीकार करते हैं।
