UP Rajya Sabha Election: यूपी में 2, 5 और 9 वाले छोटे दल बने ‘किंगमेकर’
उत्तर प्रदेश में सत्ता के बड़े दावेदार हमेशा बहुमत की भाषा बोलते हैं। सैकड़ों विधायक, लंबी फौज, गठबंधन का प्रदर्शन। लेकिन जब असल फैसला होने वाला होता है, तो कैलकुलेटर अचानक छोटी संख्याओं पर टिक जाता है। 13, 9, 6, 5 और कभी-कभी सिर्फ 2। ये आंकड़े सामान्य दिनों में नजरअंदाज किए जा सकते हैं। राज्यसभा चुनाव जैसे मौकों पर यही आंकड़े पूरे समीकरण के मालिक बन जाते हैं।16 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों के लिए मतदान होना है। प्रभावी विधानसभा संख्या 397 है। एक सीट का कोटा लगभग 37 प्रथम वरीयता वोट। इतनी साफ गणित शायद ही कभी इतनी पेचीदा राजनीति पैदा करती हो।जहां बड़ी फौज अधूरी पड़ जाती हैभाजपा के 256 विधायक हैं। सहयोगियों को जोड़कर एनडीए का आंकड़ा 289 के आसपास पहुंचता है। सात सीटें निकालने के बाद 30 वोट बचते हैं। आठवीं सीट के लिए 37 चाहिए। कमी साफ है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पास कुल 103 विधायक। दो सीटें निकालने के बाद 29 वोट। तीसरी सीट के लिए फिर कमी।यही कमी छोटी पार्टियों को अचानक केंद्र में ला देती है। अपना दल (सोनेलाल) के 13 विधायक गठबंधन की रीढ़ की तरह काम करते हैं। उनका काम नए वोट लाना नहीं, अपने वोट को टूटने से बचाना है।
राष्ट्रीय लोकदल के 9, सुहेलदेव पार्टी के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक भी इसी तस्वीर का हिस्सा हैं। पांच या छह की संख्या सामान्य विधानसभा गणित में छोटी लगती है। जब सिर्फ सात वोटों की कमी हो, तो वही संख्या निर्णायक हो जाती है।दो का जादूसबसे दिलचस्प किरदार जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के सिर्फ दो विधायक हैं। कुछ अन्य गैर-संबद्ध सदस्यों के संभावित समर्थन के साथ अगर यह आंकड़ा जुड़ता है तो एनडीए 294 के आसपास पहुंच सकता है। आठवीं सीट के 296 से फासला महज दो वोट का रह जाता है। दो विधायकों वाली पार्टी अचानक इतनी भारी लगने लगती है कि बड़े दल भी उनकी तरफ देखे बिना आगे नहीं बढ़ सकते।यही उत्तर प्रदेश की राजनीति का पुराना चरित्र है। लोकसभा या विधानसभा के सामान्य दिनों में छोटी पार्टियां हाशिए पर दिखती हैं। लेकिन जब कोटा तय हो और मार्जिन पतला हो, तो वे किंगमेकर की भूमिका में आ जाती हैं। एक वोट यहां समुद्र की बूंद नहीं, पूरा राजनीतिक शीर्षक बन सकता है।पुराने रिश्ते, नई कीमतकई सहयोगी दल पहले विपक्षी खेमे में रह चुके हैं। 2022 के गठबंधनों की यादें अभी मिटी नहीं हैं। राज्यसभा चुनाव में दल पुरानी डायरी खोलते हैं। असंतोष, टिकट की आशंका या भविष्य की सौदेबाजी—ये सब चर्चा में आ जाते हैं। 2024 में क्रॉस वोटिंग ने पहले ही दिखा दिया था कि कागज के आंकड़े मतदान वाले दिन कितने बदल सकते हैं।बसपा इस बार इस खेल से लगभग बाहर है। विधानसभा में उसका कोई विधायक नहीं। कभी निर्णायक भूमिका निभाने वाली पार्टी की अनुपस्थिति खुद में एक बड़ा राजनीतिक संकेत है।इससे आगे की तस्वीरराज्यसभा की 10 सीटें अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इससे बड़ा सवाल 2027 का है। टिकट वितरण, गठबंधन में हिस्सेदारी, नाराजगी और नए समीकरण—सब कुछ आने वाले महीनों में तय होंगे। अगर इस चुनाव में कोई सहयोगी वोट अलग दिशा में डालता है, तो उसकी गूंज सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगी। लखनऊ के सत्ता समीकरण भी उसे पढ़ेंगे।उत्तर प्रदेश की राजनीति का सूत्र सालों से एक ही है। बड़े दल बहुमत का दावा करते हैं, लेकिन निर्णायक क्षणों में असली वजन उन पार्टियों के पास होता है जिनके विधायक उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। 37 का कोटा इस सच्चाई को फिर से उजागर कर रहा है।
आखिरी कुछ वोट सबसे महंगे होते हैं। और इन्हीं महंगे वोटों के मालिक छोटी पार्टियां हैं। बड़े खेमे सैकड़ों की ताकत दिखाते हैं। असली खेल उन दो, पांच या नौ वोटों में छिपा है जो कैलकुलेटर की आखिरी खाली जगह को भर सकते हैं। यूपी की राजनीति बार-बार यही सिखाती है—ताकत सिर्फ संख्या में नहीं, सही समय पर उपलब्ध संख्या में होती है।
