क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को जेल भेजा जा सकता है? समझें Section 16 का पेंच
चुनाव आयोग (ECI) के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर उठे हालिया विवाद और उनकी गिरफ्तारी की राजनीतिक मांग ने एक अहम कानूनी विमर्श को जन्म दे दिया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उसके आधिकारिक कामकाज से जुड़े मामले में आपराधिक कार्रवाई या गिरफ्तारी की जा सकती है?
यह सवाल तब और प्रासंगिक हो गया जब द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर लिस्ट, Form 6 में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इसी विवाद (विशेषकर Special Intensive Revision – SIR) के बीच उद्धव ठाकरे सहित कई विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और जेल भेजने की मांग की है।
विवाद की जड़: Form 6 और डेटा केंद्रीकरण
ECI के भीतर यह पूरा विवाद चुनावी रोल के प्रबंधन से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, Form 6 (नए मतदाता पंजीकरण) में SIR से जुड़े सवाल जोड़े गए थे। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इसके लिए ‘Registration of Electors Rules, 1960’ में संशोधन की आवश्यकता है। बाद में संधू ने भी इसे “अनाधिकृत” और “अवैध” बताते हुए हटाने की मांग की। दोनों आयुक्तों ने राज्य और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की वोटर डेटाबेस तक पहुंच सीमित किए जाने (डेटा केंद्रीकरण) पर भी गंभीर चिंता जताई।
हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि लिखित आपत्तियां और अलग-अलग राय आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और SIR सहित पिछले एक साल के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
क्या कहता है कानून का Section 16?
राजनीतिक मांगों और कानूनी प्रावधानों में बड़ा अंतर होता है। ‘Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023’ की धारा 16 (Section 16) CEC और अन्य आयुक्तों को विशेष कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है।
कानून के मुताबिक, किसी अन्य कानून में कुछ भी होने के बावजूद, कोई भी अदालत ऐसे व्यक्ति के खिलाफ सिविल या क्रिमिनल (Civil or Criminal) कार्यवाही को स्वीकार या जारी नहीं रख सकती, जो CEC या चुनाव आयुक्त है (या रह चुका है)। यह सुरक्षा तब मिलती है जब संबंधित मामला किसी ऐसे कृत्य, बात या शब्द से जुड़ा हो जो उसने अपने “आधिकारिक कर्तव्य” के निर्वहन के दौरान किया हो। इसमें “is or was” (है या था) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, यानी यह सुरक्षा पूर्व पदाधिकारियों पर भी लागू होती है।
क्या ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता?
कानून के जानकारों के अनुसार, Section 16 सीधे तौर पर “arrest” (गिरफ्तारी) या “police investigation” (पुलिस जांच) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करता। यह मुख्य रूप से अदालत द्वारा कार्यवाही को ‘एंटरटेन’ या ‘कंटिन्यू’ करने पर रोक लगाता है।
इसलिए, इसे पूर्ण “अरेस्ट इम्युनिटी” (Arrest Immunity) नहीं कहा जा सकता। अगर भविष्य में कोई आपराधिक मामला सामने आता है, तो अदालत को यह तय करना होगा कि कथित कृत्य क्या वास्तव में ‘आधिकारिक ड्यूटी’ के दायरे में आता है या नहीं। यदि कृत्य आधिकारिक ड्यूटी के बाहर का साबित होता है, तो Section 16 की सुरक्षा नहीं मिलेगी।
कानून में कैसे जुड़ा यह सुरक्षा कवच?
यह सुरक्षा प्रावधान 2023 के मूल विधेयक में शुरुआत से मौजूद नहीं था। 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान तत्कालीन कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संशोधन के जरिए नया Clause 15A जोड़ा था, जो बाद में अधिनियम का Section 16 बना। सरकार का तर्क था कि यह प्रावधान इसलिए जरूरी है ताकि CEC और चुनाव आयुक्त बिना किसी दबाव और बाधा के स्वतंत्र रूप से अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही है कानूनी चुनौती
Section 16 की संवैधानिक वैधता फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। ‘लोक प्रहरी’ नामक NGO की याचिका पर जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था, हालांकि इस प्रावधान पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह धारा CEC और ECs को पद छोड़ने के बाद भी जरूरत से ज्यादा व्यापक सुरक्षा देती है।
ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की प्रक्रिया किसी आपराधिक मामले या गिरफ्तारी से पूरी तरह अलग एक संवैधानिक प्रक्रिया है। फिलहाल Section 16 लागू है और जब तक न्यायपालिका इसकी कोई अन्य व्याख्या नहीं करती या इसे असंवैधानिक करार नहीं देती, तब तक आधिकारिक कार्यों के लिए CEC को यह वैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।
