September 16, 2026

मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों: प्रकाश सिंह बादल के चचेरे भाई BJP में शामिल, जानें राजनीतिक सफर

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दशकों तक पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथ साये की तरह रहने वाले और शिरोमणि अकाली दल के भीतर उठने वाले असंतोष को संभालने वाले मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों (78) ने अब अपनी नई राजनीतिक पारी की शुरुआत की है। 1997 से 2002 तक प्रकाश सिंह बादल के राजनीतिक सचिव रहे सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी ढिल्लों ने सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया।

दिवंगत प्रकाश सिंह बादल के सगे चचेरे भाई ढिल्लों ने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली। उनके साथ उनके बेटे अमरवीर सिंह बादल भी भाजपा में शामिल हुए। 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उनका यह कदम राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है।

‘मुझे बादल होने पर गर्व, लेकिन BJP की विचारधारा दिल के करीब’

लंबी विधानसभा क्षेत्र के बादल गांव में ‘मेजर भूपी’ के नाम से मशहूर ढिल्लों ने भाजपा में शामिल होने के बाद कहा, “मुझे बादल होने पर गर्व है। लेकिन अब भाजपा की विचारधारा मेरे दिल के ज्यादा करीब है।” उन्होंने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और उनके द्वारा भारत को वैश्विक पटल पर शीर्ष पर ले जाने के प्रयासों से प्रभावित होकर भाजपा में आए हैं।

बादल के चुनाव अभियानों में पर्दे के पीछे से संभालते थे मोर्चा

ढिल्लों के पिता गुर राज सिंह 1952 से 1956 तक पहली राज्यसभा के सदस्य रहे थे और वह पहले अकाली सांसद माने जाते हैं। ढिल्लों ने खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन वह प्रकाश सिंह बादल की कोर टीम का अहम हिस्सा थे। जब बादल सत्ता में थे, तब ढिल्लों का काम केवल दफ्तरों तक सीमित नहीं था। रूठे हुए नेताओं को मनाना, नाराज कार्यकर्ताओं के बीच जाना और चुनावी डैमेज कंट्रोल करना ढिल्लों की मुख्य जिम्मेदारी हुआ करती थी। कांग्रेस नेता और रिश्तेदार जगपाल सिंह अबुलखुराना याद करते हैं कि कैसे ढिल्लों जमीनी स्तर पर जाकर असंतुष्टों को मनाते थे और फिर बादल साहब के साथ मिलकर रणनीति बनाते थे।

सेना में दी 21 साल की सेवा, राज्यपाल के एडीसी भी रहे

ढिल्लों का सफर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। द लॉरेंस स्कूल, सनावर से पढ़ाई के बाद वह एनडीए (NDA) गए और दिसंबर 1969 में सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट बने। उन्होंने 21 साल तक आर्टिलरी रेजिमेंट में सेवाएं दीं और 1983 में मेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए। वह 1979 से 1982 के बीच तत्कालीन पंजाब के राज्यपाल जय सुख लाल हाथी के एडीसी भी रहे। सेना से रिटायर होने के बाद वह परिवार के साथ खेतों और समाज सेवा में लौट आए।

2022 के चुनाव ने बदल दी सोच

ढिल्लों ने माना कि 2022 का विधानसभा चुनाव उनके लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था। इस चुनाव में सुखबीर सिंह बादल की हार और अकाली दल का सिर्फ तीन सीटों पर सिमट जाना उनके लिए एक बड़ा झटका था। ढिल्लों ने बताया, “बादल साहब के निधन के बाद मैं चुप रहा। भाजपा की ओर से मुझसे संपर्क किया गया और मैंने पार्टी में शामिल होने का मन बना लिया।”

‘सुखबीर से खून का रिश्ता, लेकिन अब राजनीतिक रास्ते अलग’

भाजपा में जाने का मतलब बादल परिवार से रिश्ता तोड़ना नहीं है। ढिल्लों ने स्पष्ट किया, “सुखबीर सिंह बादल मेरे भतीजे हैं। उनकी अपनी विचारधारा है और मेरी विचारधारा अब भाजपा की हो गई है। हम खून के रिश्तेदार हैं, लेकिन हमारे राजनीतिक हित अब अलग-अलग हैं।”

यह पूछे जाने पर कि क्या सुखबीर बादल ने उन्हें रोकने की कोशिश की, ढिल्लों ने कहा कि उनके मन में अकाली दल या सुखबीर के प्रति कोई कड़वाहट नहीं है। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम पर सुखबीर सिंह बादल के सहयोगी परमबंस सिंह रोमाना ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “ढिल्लों अकाली दल का हिस्सा नहीं थे, इसलिए हमें इस बारे में कुछ नहीं कहना है।”

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले ढिल्लों को भाजपा आगामी चुनावों में किस तरह की भूमिका सौंपती है।