September 16, 2026

श्रीदेवी के चेन्नई फार्म हाउस पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने दिया मध्यस्थता का सुझाव

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दिवंगत अभिनेत्री श्रीदेवी की पारिवारिक संपत्ति से जुड़े एक पुराने विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों को अहम सुझाव दिया है। चेन्नई के शोलींगनलूर इलाके में स्थित करीब 4.77 एकड़ जमीन को लेकर चल रहे इस विवाद पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा है कि वह इस मामले को सुलझाने के लिए हाई कोर्ट के किसी पूर्व जज को मध्यस्थ (Mediator) नियुक्त करेगी।

जस्टिस के. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने फिलहाल संपत्ति को लेकर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का निर्देश दिया है। इसका मतलब है कि अगली सुनवाई (18 दिसंबर) तक जमीन की मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। अदालत ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होकर आपसी बातचीत से विवाद सुलझाने की सलाह दी है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद चेन्नई के शोलींगनलूर इलाके में ईस्ट कोस्ट रोड के पास की 4.77 एकड़ जमीन का है। इस जमीन को साल 1988 में श्रीदेवी, उनकी मां और बहन ने चार अलग-अलग सेल डीड (Sale Deed) के जरिए खरीदा था।

साल 2018 में श्रीदेवी के निधन के बाद 2023 में इस संपत्ति से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड में श्रीदेवी के पति बोनी कपूर और उनकी बेटियों जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर का नाम दर्ज किया गया। वर्तमान में इस जमीन पर बोनी कपूर के परिवार का एक फार्म हाउस बना हुआ है।

विवाद की जड़ क्या है?

राजस्व रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन के बाद एम.सी. शिवकामी नामक महिला, उसके भाई एम.सी. नटराजन और मां चंद्रभानु ने चेंगलपट्टू की सिविल कोर्ट में एक मामला दायर कर दिया। उन्होंने दावा किया कि वे 1943 में इस जमीन को खरीदने वाले मूल मालिक एम.सी. संबंद मुदलियार के वंशज हैं और संपत्ति पर उनका 1/5 हिस्सा बनता है। याचिकाकर्ताओं ने 1988 में श्रीदेवी परिवार द्वारा की गई जमीन की खरीद को अवैध बताया।

मद्रास हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था?

निचली अदालत में दायर इस मुकदमे को कपूर परिवार ने मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। इस साल मई में जस्टिस टी.वी. तमिलसेल्वी की बेंच ने बोनी कपूर और उनकी बेटियों को राहत देते हुए सिविल सूट को खारिज कर दिया था।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि 1988 में हुई बिक्री को करीब 40 साल बाद चुनौती दी जा रही है, जो कानून में तय समय-सीमा (Limitation) के चलते स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि याचिकाकर्ताओं का कानूनी वारिस होने का दावा और वारिस प्रमाण पत्र पहले ही रद्द किया जा चुका था, ऐसे में मुकदमा दाखिल करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

याचिकाकर्ताओं की सुप्रीम कोर्ट में दलील

मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि हाई कोर्ट ने मामले में मिनी ट्रायल चलाकर अति सक्रियता दिखाई। उनका तर्क था कि एम.सी. मुदलियार के बेटे चंद्रशेखरन ने दो शादियां की थीं और एक शादी को कानूनन अमान्य बताकर उससे पैदा हुई संतानों का संपत्ति से हक खत्म नहीं किया जा सकता।