September 15, 2026

हत्या के बाद जातीय अंकगणित: यूपी में अपराध से पहले वोट की गिनती?

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उत्तर प्रदेश में अपराध कोई नया संकट नहीं। लेकिन अब हत्या सिर्फ हत्या नहीं रह गई। शव ठंडा भी नहीं होता कि जाति का नाम निकल आता है, और उसी पल राजनीतिक नैरेटिव तैयार हो जाता है। अंकित बालियान, विनोद साहनी और शिवकुमार त्रिपाठी—तीन अलग-अलग घटनाएं, तीन अलग-अलग जातियां, लेकिन एक ही सूत्र: मृतक की पहचान को चुनावी हथियार बना देना।2027 विधानसभा चुनाव की घड़ी नजदीक है। ऐसे में कानून-व्यवस्था का हर बड़ा मामला अब सिर्फ पुलिस फाइल में नहीं, राजनीतिक बैलेंस शीट में दर्ज हो रहा है।
अंकित बालियान: जाट आक्रोश या चुनावी मौका?
अंकित बालियान की हत्या के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने जाट समाज में आक्रोश की बात उठाई। पश्चिमी यूपी में जाट सिर्फ जाति नहीं, प्रभावशाली वोट बैंक हैं। उनकी नाराजगी कई सीटों का समीकरण बिगाड़ सकती है।लेकिन NDA सहयोगी और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने तुरंत आपत्ति जताई। उन्होंने साफ कहा—हत्या को जाति से जोड़ना संवेदनहीनता है। एक ही गठबंधन के अंदर दो अलग-अलग भाषा। विपक्ष जाति का कार्ड खेल रहा है, सत्ता पक्ष का सहयोगी जाति को मुद्दा बनाने से बचने की सलाह दे रहा है। जाट वोट की अहमियत इतनी है कि दोनों तरफ से सावधानी और मौका तलाशने की होड़ साफ दिख रही है।
गोंडा: मंत्री का धरना और निषाद बनाम ऊंची जाति का नैरेटिव
गोंडा में बर्तन व्यापारी विनोद कुमार साहनी की मौत ने सियासी पारा और चढ़ा दिया। मंत्री और निषाद पार्टी अध्यक्ष संजय निषाद खुद धरना पर बैठ गए। आरोपियों की ऊंची जाति सामने आई तो निषाद बनाम ऊंची जाति का पूरा नैरेटिव खड़ा हो गया।दिलचस्प बात यह है कि संजय निषाद भाजपा सरकार के मंत्री हैं। अपनी ही सरकार के प्रशासन के खिलाफ धरना। और उनके साथ विपक्षी समाजवादी पार्टी के नेता भी दिखे। यह तस्वीर गठबंधन की आंतरिक दरार और वोट बैंक की मजबूरी दोनों को उजागर करती है।पुलिस जांच का दूसरा पहलू भी है। शुरुआती जांच में हमले की वजह सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद बताई गई। पोस्टमार्टम में गोली या धारदार हथियार के घाव नहीं मिले। मौत लाठी की चोटों से हुई। राजनीतिक बयान एक दिशा में जा रहे हैं, जांच दूसरी दिशा में। लेकिन चुनावी मौसम में जांच की बारीकियां अक्सर नैरेटिव के आगे फीकी पड़ जाती हैं।
गोरखपुर: ब्राह्मण सुरक्षा का सवाल
गोरखपुर में बिजली विभाग के ठेकेदार शिवकुमार त्रिपाठी की हत्या के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय परिवार से मिलने पहुंचे। ब्राह्मण सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का मुद्दा तुरंत राजनीतिक बहस में आ गया।ब्राह्मण समुदाय लंबे समय से भाजपा का अहम सामाजिक आधार रहा है। आबादी करीब 10 फीसदी होने के बावजूद उनका प्रभाव कहीं ज्यादा है। 2027 से पहले समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में गोरखपुर की घटना सिर्फ अपराध नहीं, ब्राह्मण समीकरण को छूने वाला मुद्दा बन गई।
जाट, ब्राह्मण, निषाद:
क्यों इतनी महंगी हैं ये जातियां?जाटों की राज्यव्यापी आबादी करीब 3.6 फीसदी है, लेकिन पश्चिमी यूपी में कई सीटों पर उनका दबदबा निर्णायक है। ब्राह्मण करीब 10 फीसदी हैं और भाजपा के लिए पारंपरिक आधार। निषाद समाज पूर्वांचल और कई क्षेत्रों में अपनी ताकत रखता है। संजय निषाद इसी आधार के सबसे बड़े चेहरे हैं।जब ये तीन समुदाय एक साथ चर्चा में आते हैं तो साफ हो जाता है कि 2027 का चुनाव सिर्फ विकास या कानून-व्यवस्था का नहीं, सामाजिक समीकरणों का भी होगा। हर हत्या के बाद जाति का नाम निकलना कोई संयोग नहीं। यह चुनावी गणित की मजबूरी है।
असली सवाल: न्याय पीछे, जाति आगे?
तीनों मामलों की तस्वीर एक जैसी है। हत्या होती है। पुलिस जांच शुरू करती है। आरोपी गिरफ्तार होते हैं। लेकिन चर्चा जल्दी ही मृतक की जाति और उसके वोट बैंक पर केंद्रित हो जाती है।अंकित बालियान के मामले में जाट पहचान, गोंडा में निषाद पहचान, गोरखपुर में ब्राह्मण पहचान। अपराध की घटना के साथ-साथ उसका सामाजिक और चुनावी मतलब तलाशा जा रहा है।यह खतरनाक रुझान है। जब हर हत्या को जाति के चश्मे से देखा जाने लगे तो न्याय की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है। पीड़ित परिवार को न्याय मिलने से पहले राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो जाती है। सरकार को बचाव में उतरना पड़ता है। विपक्ष मौका तलाशता है।
सहयोगी दल अपने वोट बैंक की रक्षा में सक्रिय हो जाते हैं।2027 करीब है। यूपी की राजनीति में अपराध और जाति का गठजोड़ नया नहीं। लेकिन अब यह और नंगा और अधिक संगठित रूप ले चुका है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कानून-व्यवस्था कैसी है। सवाल यह भी है कि क्या हत्या के बाद पहले न्याय की बात होगी, या फिर से जाति की गिनती शुरू हो जाएगी?जवाब 2027 के नतीजों में छिपा हो सकता है। लेकिन फिलहाल तस्वीर साफ है—यूपी में अपराध अब सिर्फ अपराध नहीं रह गया। वह चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुका है।