September 15, 2026

‘सिर्फ बुलडोजर से काम नहीं चलेगा, नौकरी भी चाहिए’, पहली बार वोट डालने वाले युवाओं की दो-टूक

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही पहली बार मतदान करने जा रहे नए मतदाताओं (First-time voters) की प्राथमिकताएं खुलकर सामने आने लगी हैं। 18 से 22 वर्ष के इस आयु वर्ग के युवाओं का साफ कहना है कि वे किसी दल के पारंपरिक नारों या भावनात्मक मुद्दों के आधार पर फैसला नहीं करेंगे, बल्कि उनके लिए भविष्य, रोजगार और शिक्षा की गुणवत्ता सबसे अहम पैमाना होगी।

लखनऊ के कॉलेज परिसरों और कोचिंग सेंटरों में हुई बातचीत के दौरान युवाओं ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी राजनीतिक दल के अंधभक्त नहीं हैं और अपना वोट पूरी तरह जमीनी मुद्दों को देखकर देंगे।

पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली पर उठा भरोसा बातचीत में लगभग सभी युवाओं ने बेरोजगारी और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में हो रही गड़बड़ियों को अपनी सबसे बड़ी चिंता बताया।

  • कनिष्क का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बीच लगातार पेपर लीक की खबरें आने से सरकारी नौकरियों से युवाओं का भरोसा टूटा है। उनका कहना है कि आने वाले चुनाव में उसी दल को समर्थन मिलेगा जो रोजगार को लेकर एक ठोस और स्पष्ट नीति पेश करेगा।

  • प्रथिमेश के मुताबिक, महंगाई अपनी जगह है लेकिन युवाओं की असल परेशानी रोजगार के अवसर न मिलना है। प्राइवेट सेक्टर में भी अनुभव और स्किल की मांग की जाती है, ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह स्किल डेवलपमेंट और स्टार्टअप्स को वास्तविक रूप से बढ़ावा दे।

  • श्रेयस प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अनिकेत ने कहा कि बार-बार होने वाले पेपर लीक ने भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता खत्म कर दी है। यह केवल नौकरियों का अभाव नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था पर विश्वास का संकट है।

‘सुरक्षा सुधरी, लेकिन सिर्फ बुलडोजर काफी नहीं’ छात्रों ने योगी सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर हुए सुधारों को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही यह भी साफ किया कि अकेले इसके दम पर युवाओं की जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं।

वाराणसी के आदित्य ने कहा कि पहले के मुकाबले रात में बाहर निकलने का माहौल जरूर सुधरा है, लेकिन सिर्फ बुलडोजर चलाने से काम नहीं चलेगा, विकास के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी दिखने चाहिए। वहीं राजधानी लखनऊ की शालिनी का कहना था कि राम मंदिर का निर्माण हो चुका है, लेकिन अब सवाल आगे के भविष्य का है। युवाओं को अब ठोस रूप से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार चाहिए।

दलों की विचारधारा पर काम को तरजीह राजनीतिक दलों को लेकर नए मतदाताओं का रुख काफी व्यावहारिक नजर आ रहा है। भाजपा के संदर्भ में जहां कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों की चर्चा है, वहीं स्थानीय स्तर पर एंटी-इंकम्बेंसी और रोजगार को लेकर असंतोष भी सामने आ रहा है।

दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की बात पर पिछड़े और दलित वर्ग के युवाओं ने दिलचस्पी जरूर दिखाई, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ जातिगत गोलबंदी के आधार पर वोट नहीं पड़ेगा। छात्रों का कहना था कि विचारधारा अपनी जगह हो सकती है, लेकिन जमीन पर काम दिखना जरूरी है।

कांग्रेस या अन्य दलों को लेकर चर्चाएं बेहद सीमित रहीं। ज्यादातर पहली बार मतदान करने जा रहे युवाओं का रुख यह है कि वे पार्टी के सिंबल से ज्यादा स्थानीय उम्मीदवार की छवि और उसके ठोस वादों को प्राथमिकता देंगे। 18 से 22 साल का यह नया वोटर समूह पुरानी निष्ठाओं से बंधे रहने के बजाय सीधे सवालों के ठोस जवाब मांग रहा है।