न नेतन्याहू को बहुमत, न विपक्ष को; 19 सीटें जीतने वाली अरब पार्टियां बनीं ‘अछूत किंगमेकर’

Benjamin Netanyahu

इजरायल की राजनीति एक बार फिर गहरे संकट और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। हाल ही में संपन्न हुए इजरायली संसद (नेसेट) के चुनावों के नतीजों और रुझानों ने देश को एक बार फिर त्रिशंकु संसद के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक तरफ प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता बचाने के लिए हर राजनीतिक दांव-पेंच आजमा रहे हैं, तो वहीं उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट उन्हें सत्ता से बेदखल करने की पूरी कोशिश में जुटे हैं। इस पूरे सियासी ड्रामे का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि लगभग 19 सीटें जीतकर ‘किंगमेकर’ की स्थिति में आई अरब पार्टियां इजरायल की मुख्यधारा की राजनीति में पूरी तरह से हाशिए पर हैं।

त्रिशंकु संसद और 61 का जादुई आंकड़ा

120 सीटों वाली इजरायली संसद (नेसेट) में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों के जादुई आंकड़े की जरूरत होती है। शुरुआती नतीजों के अनुसार, बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को करीब 53 सीटें मिलने का अनुमान है। दूसरी ओर, गादी आइजेनकोट के विपक्षी गुट को लगभग 48 सीटें मिलती दिख रही हैं।

स्पष्ट है कि जनता ने किसी एक पक्ष को बहुमत नहीं दिया है। दशकों से सत्ता के केंद्र में रहे नेतन्याहू अपनी राजनीतिक चतुराई और जोड़-तोड़ के जरिए 61 के आंकड़े तक पहुंचने की जुगत में लगे हुए हैं, जिसके लिए वह अपने विरोधियों से भी हाथ मिलाने के विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।

किंगमेकर हैं अरब पार्टियां, पर स्वीकार्यता नहीं

इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू अरब पार्टियों (जैसे ‘जॉइंट लिस्ट’ और ‘रआम’) का प्रदर्शन रहा है, जिन्होंने 19 सीटें हासिल की हैं। संख्या बल के आधार पर तकनीकी रूप से वे किंगमेकर हैं, जो यह तय कर सकती हैं कि अगली सरकार किसकी बनेगी। लेकिन इजरायली राजनीति के ध्रुवीकरण के चलते ये पार्टियां दोनों प्रमुख खेमों के लिए ‘अछूत’ बनी हुई हैं।

प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि अरब पार्टियों का समर्थन लेना या उनके साथ गठबंधन करना देश के लिए “शर्मनाक” है। वहीं, विपक्षी खेमा भी खुलकर इन दलों से हाथ मिलाने में कतरा रहा है, क्योंकि ऐसा करना राजनीतिक आत्महत्या के समान माना जाता है। नतीजतन, संसद में तीसरी सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद सरकार गठन में अरब पार्टियों की कोई भूमिका तय नहीं हो पा रही है।

अब क्या हैं विकल्प और राष्ट्रपति की भूमिका?

स्पष्ट बहुमत न होने की स्थिति में अब सबकी निगाहें इजरायल के राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग पर टिकी हैं। वह सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से विचार-विमर्श करने के बाद उस नेता को सरकार बनाने का आमंत्रण देंगे, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे अधिक संभावना होगी।

नेतन्याहू छोटे दलों और असंतुष्ट सांसदों को अपने पाले में कर बहुमत हासिल करने की कोशिश में हैं। वहीं, गादी आइजेनकोट और विपक्षी दल नेतन्याहू के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों और युद्ध के बाद के असंतोष को भुनाकर उन्हें सत्ता से दूर रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।