जब कैंसर सामने आया, पोप ने भी लिया डॉक्टरों का सहारा, जानिए आधुनिक चिकित्सा की ताकत
बीमारी जब तक दूसरे को होती है, तब तक दुनिया में नुस्खों की कोई कमी नहीं रहती। कोई कहता है पानी पर फूंक मारकर पी लो, कोई दावा करता है कि अमुक चीज से हर बीमारी गायब हो जाएगी, तो कोई गंभीर से गंभीर रोग को आस्था की परीक्षा बताने लगता है। लेकिन जैसे ही बीमारी अपने दरवाजे पर दस्तक देती है, तस्वीर बदल जाती है। तब चमत्कार के दावों से ज्यादा डॉक्टर की डिग्री, अस्पताल की मशीनें, जांच की रिपोर्ट और इलाज की योजना याद आने लगती है।
कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप लियो XIV के स्वास्थ्य से जुड़ी कैंसर और ऑपरेशन की खबर ने इसी सवाल को फिर प्रासंगिक बना दिया है। जब गंभीर बीमारी का सामना होता है, तो भरोसा वैज्ञानिक चिकित्सा पर किया जाता है या उन दावों पर, जिनका कोई विश्वसनीय चिकित्सकीय प्रमाण नहीं है?
बीमारी अमीर-गरीब, धर्मगुरु और आम आदमी में फर्क नहीं करती
कैंसर किसी का पद देखकर शरीर में प्रवेश नहीं करता। वह यह नहीं पूछता कि मरीज दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक पदों में से किसी पर बैठा है या किसी छोटे से गांव में मेहनत-मजदूरी करता है। बीमारी के सामने हर इंसान का शरीर जैविक नियमों से चलता है।
इसीलिए जब किसी गंभीर बीमारी का सामना होता है, तो डॉक्टर जांच करते हैं, बीमारी की प्रकृति समझते हैं और उपलब्ध चिकित्सा विकल्पों के आधार पर इलाज तय करते हैं। जरूरत के अनुसार सर्जरी, दवाएं, रेडिएशन या दूसरी उपचार पद्धतियां अपनाई जा सकती हैं।
यहां एक दिलचस्प विडंबना है। विज्ञान की मदद से बने अस्पताल में इलाज कराने पर किसी को आपत्ति नहीं होती, लेकिन जब अपने आसपास के किसी व्यक्ति को डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी जाती है, तो अचानक सलाहों की एक पूरी बारात निकल पड़ती है। कोई घरेलू नुस्खा बताता है, कोई चमत्कारी पानी की महिमा सुनाता है और कोई कहता है कि पहले यह उपाय आजमा लो।
सवाल यह है कि अगर ये उपाय वास्तव में कैंसर का इलाज हैं, तो उनके असर का विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण कहां है?
फूंका हुआ पानी: आस्था अपनी जगह, इलाज अपनी जगह
पानी पीना अच्छी आदत है। प्रार्थना करना किसी व्यक्ति को मानसिक शांति दे सकता है। परिवार का साथ और आध्यात्मिक विश्वास कठिन समय में भावनात्मक सहारा भी बन सकते हैं। लेकिन इन बातों और कैंसर का उपचार करने के दावे के बीच एक बड़ी रेखा है।
पानी पर फूंक मारने से कैंसर की गांठ समाप्त हो जाती है, कैंसर कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं या ऑपरेशन की जरूरत खत्म हो जाती है।
आस्था का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं है कि हर चिकित्सकीय दावे को भी सच मान लिया जाए। प्रार्थना किसी का निजी विश्वास हो सकती है, लेकिन उसे प्रमाणित इलाज का विकल्प बताना मरीज के लिए खतरनाक हो सकता है।
अगर केवल फूंके हुए पानी से कैंसर ठीक हो जाता, तो चिकित्सा विज्ञान को इतने वर्षों तक कैंसर की अलग-अलग किस्मों, उनकी जांच और उपचार के तरीके विकसित करने में इतनी मेहनत क्यों करनी पड़ती? अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों, पैथोलॉजी लैब, ऑपरेशन थिएटर और कैंसर उपचार केंद्रों की जरूरत ही क्यों होती?
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन जवाब सीधा है: कैंसर कोई ऐसा रोग नहीं है जिसे किसी एक घरेलू नुस्खे से हर मरीज में ठीक किया जा सके।
दूसरों को नुस्खे, अपने लिए विशेषज्ञ डॉक्टर क्यों?
समाज में अक्सर ऐसा दृश्य देखने को मिलता है कि किसी दूसरे व्यक्ति की बीमारी पर सलाह देने वाले लोग आत्मविश्वास से भरे रहते हैं। उनके पास हर समस्या का समाधान है। किसी को बुखार हो तो घरेलू उपाय, किसी को गंभीर बीमारी हो तो चमत्कारी उपचार और किसी को अस्पताल जाने की सलाह दी जाए तो लंबा व्याख्यान।
लेकिन जब मामला अपने परिवार का हो, तो वही लोग जांच रिपोर्ट का इंतजार करते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टर से दूसरी राय लेते हैं। इलाज के विकल्प समझते हैं और अस्पताल की सुविधाओं की जानकारी जुटाते हैं।
इस विरोधाभास पर सवाल उठाना जरूरी है। अगर आधुनिक चिकित्सा पर भरोसा करना अपने लिए समझदारी है, तो किसी दूसरे मरीज को प्रमाणित इलाज से दूर रखने की सलाह देना कैसी समझदारी है?
यह सवाल केवल धार्मिक व्यक्तियों से नहीं, बल्कि उन सभी लोगों से है जो बिना प्रमाण किसी उपचार को चमत्कार बताकर बेचते या प्रचारित करते हैं।
कैंसर कोई नैतिक परीक्षा नहीं, एक गंभीर बीमारी है
किसी मरीज को यह कहना कि उसकी बीमारी इसलिए हुई क्योंकि उसका विश्वास कमजोर है, उसने सही पूजा नहीं की या उसने कोई खास अनुष्ठान नहीं किया, न केवल असंवेदनशील है बल्कि मरीज पर अनावश्यक मानसिक बोझ भी डाल सकता है।
कैंसर कई प्रकार का होता है और उसके कारण भी अलग-अलग हो सकते हैं। उम्र, आनुवंशिक बदलाव, कुछ पर्यावरणीय और जीवनशैली संबंधी कारक तथा अन्य परिस्थितियां जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं। हर मरीज की बीमारी का कारण एक जैसा नहीं होता।
मरीज को दोष देने के बजाय उसे सही जानकारी, सहानुभूति और उपचार तक पहुंच की जरूरत होती है। आस्था किसी को मानसिक ताकत दे सकती है, लेकिन बीमारी को मरीज के चरित्र, कर्म या विश्वास की कमी का प्रमाण मान लेना उचित नहीं है।
विज्ञान से इलाज कराना आस्था का अपमान नहीं
धार्मिक विश्वास रखने वाले लोग भी डॉक्टर के पास जाते हैं। वैज्ञानिक चिकित्सा अपनाने का अर्थ यह नहीं कि किसी व्यक्ति को अपनी प्रार्थना या आध्यात्मिक परंपरा छोड़नी पड़ेगी। दोनों के क्षेत्र अलग हो सकते हैं।
समस्या तब शुरू होती है जब किसी व्यक्ति की निजी आस्था को सभी मरीजों के लिए प्रमाणित चिकित्सा का विकल्प घोषित कर दिया जाता है। किसी धार्मिक अनुष्ठान से मानसिक सुकून मिल सकता है, लेकिन उससे कैंसर का उपचार होने का दावा अलग बात है। उसके लिए प्रमाण चाहिए।
और प्रमाण का मतलब किसी चमत्कार की कहानी, किसी अनजान व्यक्ति का वीडियो या किसी बाबा के मंच से किया गया ऐलान नहीं है। चिकित्सा में प्रमाण का मतलब व्यवस्थित शोध, सुरक्षित उपचार और परिणामों का वैज्ञानिक मूल्यांकन है।
मरीज को उम्मीद चाहिए या झूठा भरोसा?
कैंसर के मरीज और उनके परिवार पहले ही भय, खर्च और अनिश्चितता से गुजरते हैं। ऐसे समय में उन्हें यह बताना कि एक गिलास पानी, कोई विशेष मंत्र या कोई अप्रमाणित नुस्खा बीमारी को खत्म कर देगा, उन्हें झूठी उम्मीद दे सकता है। सबसे बड़ा नुकसान तब होता है जब इस उम्मीद में जरूरी जांच या इलाज में देरी हो जाती है।
उम्मीद देना जरूरी है, लेकिन उम्मीद के नाम पर भ्रम फैलाना नहीं। मरीज को यह बताना चाहिए कि कैंसर के अनेक प्रकार हैं, उपचार के विकल्प अलग-अलग होते हैं और सही योजना विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह से बनती है। इलाज के दौरान भावनात्मक और आध्यात्मिक सहारा भी लिया जा सकता है, बशर्ते वह प्रमाणित चिकित्सा की जगह न ले।
प्रार्थना कीजिए, लेकिन इलाज को फूंक मत मारिए
पोप हों या आम नागरिक, धर्मगुरु हों या वैज्ञानिक, गंभीर बीमारी के सामने सबसे जरूरी है सही जांच, विशेषज्ञ चिकित्सा और उपचार के विकल्पों की समझ। किसी के निजी विश्वास पर हमला करना इस बहस का उद्देश्य नहीं है। सवाल उन दावों का है जो बिना वैज्ञानिक प्रमाण के मरीजों को इलाज छोड़ने या टालने के लिए प्रेरित करते हैं।
फूंके हुए पानी से किसी को मानसिक सुकून मिलता है, तो वह उसका निजी अनुभव हो सकता है। लेकिन उसे कैंसर का इलाज बताना एक बिल्कुल अलग दावा है, जिसके लिए विश्वसनीय प्रमाण चाहिए।
क्योंकि बीमारी के समय मरीज को चमत्कार का विज्ञापन नहीं, सही इलाज का रास्ता चाहिए। प्रार्थना मन को सहारा दे सकती है, लेकिन कैंसर के उपचार का फैसला प्रमाणित चिकित्सा और विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही होना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि फूंका हुआ पानी कैंसर से लड़ता तो अस्पतालों में ऑन्कोलॉजी विभाग नहीं, चमत्कार विभाग खुलते!
