कांच नगरी फिरोजाबाद में क्या फिर खिलेगा कमल या चलेगा ‘साइकिल’ का जोर?

akhilesh yadav

अपनी मशहूर कांच और चूड़ी उद्योग के लिए दुनिया भर में पहचानी जाने वाली ‘सुहाग नगरी’ फिरोजाबाद उत्तर प्रदेश की सियासत में भी खासा दखल रखती है। राजनीतिक दृष्टि से यह इलाका समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के परिवार का प्रमुख प्रभाव क्षेत्र रहा है। हर चुनाव की तरह 2027 के विधानसभा चुनाव में भी यहां के जातीय समीकरण और यादव वोट बैंक की भूमिका पर सबकी नजरें टिकी हैं।

आइए जानते हैं कि 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा नतीजों के बाद फिरोजाबाद की पांचों विधानसभा सीटों पर क्या सियासी माहौल बन रहा है।

जिले का डेमोग्राफिक प्रोफाइल

2011 की जनगणना के अनुसार, फिरोजाबाद जिले की कुल आबादी करीब 24 लाख 98 हजार दर्ज की गई थी, जिसमें पुरुषों की संख्या लगभग 13.32 लाख और महिलाओं की संख्या करीब 11.66 लाख थी। जिले का लिंगानुपात प्रति हजार पुरुषों पर 875 महिलाओं का है।

साक्षरता दर लगभग 72 प्रतिशत है (पुरुष साक्षरता करीब 81% और महिला साक्षरता करीब 62%)। धार्मिक बनावट की बात करें तो जिले में हिंदू आबादी करीब 86 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी लगभग 13 प्रतिशत है।

जिले की पांच विधानसभा सीटें: 2022 में सपा ने 3 और भाजपा ने 2 पर किया था कब्जा

फिरोजाबाद जिले में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं—टूंडला, जसराना, फिरोजाबाद (सदर), शिकोहाबाद और सिरसागंज। ये सभी सीटें फिरोजाबाद लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं। इनमें टूंडला सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है, जबकि बाकी चारों सीटें सामान्य वर्ग में हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में जिले की पांच में से तीन सीटों पर सपा और दो पर भाजपा ने जीत हासिल की थी:

  • टूंडला (सुरक्षित): भाजपा के प्रेमपाल सिंह धनगर ने सपा उम्मीदवार राकेश बाबू एडवोकेट को करीब 32 हजार वोटों से हराया था। राकेश बाबू पहले इस सीट से बसपा के टिकट पर तीन बार विधायक रह चुके थे।

  • जसराना: इस सीट पर जिले का सबसे करीबी और सांस रोक देने वाला मुकाबला हुआ था। सपा के सचिन यादव ने भाजपा के मानवेंद्र प्रताप सिंह लोधी को महज 836 वोटों के मामूली अंतर से मात दी थी।

  • फिरोजाबाद (सदर): भाजपा के मनीष असीजा ने सपा प्रत्याशी सैफुर्रहमान उर्फ छुट्टन भाई को लगभग 13 हजार वोटों से पराजित किया। यह जिले की सबसे बड़ी मतदाता संख्या वाली सीट है और भाजपा का अभेद्य दुर्ग मानी जाती है।

  • शिकोहाबाद: यहां भी बेहद कांटे की टक्कर देखने को मिली थी। सपा के मुकेश चंद्र वर्मा ने भाजपा प्रत्याशी ओमप्रकाश वर्मा को केवल 1,116 वोटों के अंतर से शिकस्त दी थी।

  • सिरसागंज: सपा के सर्वेश सिंह यादव ने भाजपा के टिकट पर उतरे मुलायम परिवार के समधी हरिओम यादव को चुनाव हराया। हरिओम यादव 2017 में सपा से विधायक बने थे, लेकिन 2022 के चुनाव से ठीक पहले भाजपा में शामिल हो गए थे।

2024 की लोकसभा जीत ने बढ़ाया सपा का हौसला

हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिले की 5 में से 4 सीटें (टूंडला, जसराना, फिरोजाबाद और शिकोहाबाद) जीतकर भगवा परचम लहराया था, लेकिन 2022 के विधानसभा और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने जबर्दस्त वापसी की।

2024 के आम चुनाव में सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव ने भाजपा के विश्वदीप सिंह को करीब 89 हजार वोटों के बड़े अंतर से हराकर फिरोजाबाद संसदीय सीट पर कब्जा जमाया। 2019 में शिवपाल सिंह यादव के अलग चुनाव लड़ने से सपा का वोट बिखर गया था और भाजपा जीत गई थी, लेकिन 2024 में चाचा-भतीजे (अखिलेश और शिवपाल) की एकजुटता ने सपा को बड़ी बढ़त दिलाई। इस जीत से 2027 के चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं।

जातीय समीकरण: किस सीट पर किसका है दबदबा?

फिरोजाबाद की पांचों सीटों पर जीत-हार की चाबी सामाजिक और जातीय गोलबंदी के हाथों में है:

  • टूंडला (सुरक्षित): इस सीट पर सबसे बड़ा वर्ग जाटव मतदाताओं का है (करीब 65 हजार)। इसके बाद ठाकुर और बघेल-धनगर समाज की आबादी करीब 50-50 हजार है। यादव मतदाता करीब 40 हजार, जबकि निषाद और मुस्लिम मतदाता 20-20 हजार के आसपास हैं। कुशवाहा और जाट बिरादरी की भी यहां अच्छी मौजूदगी है।

  • जसराना: यह सीट पारंपरिक रूप से यादव बहुल मानी जाती है। 1993 से 2007 तक यहां सपा के रामवीर सिंह लगातार जीतते रहे थे। यादव वोट बैंक के अलावा यहां लोधी और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मतदाता परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

  • फिरोजाबाद (सदर): शहरी मिजाज वाली इस सीट पर मुस्लिम और वैश्य समाज सबसे बड़े मतदाता समूह हैं। इनके अलावा जाटव, राठौर, शंखवार, ब्राह्मण और यादव मतदाता भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसी सामाजिक संतुलन के चलते भाजपा यहां लगातार तीन बार से जीत रही है।

  • शिकोहाबाद: इस विधानसभा क्षेत्र में यादव मतदाता सबसे बड़ी संख्या में हैं। इसके बाद निषाद-राजपूत और तीसरे नंबर पर दलित (जाटव) समाज आता है, जिनका झुकाव नतीजे तय करता है।

  • सिरसागंज: यह पूरी तरह से यादव बहुल सीट है। सैफई परिवार से सीधा जुड़ाव और स्थानीय समीकरणों के चलते यहां का मुकाबला हमेशा यादव वोटरों की लामबंदी के इर्द-गिर्द ही घूमता है।

2027 की बिसात: सेंधमारी की तैयारी में भाजपा, गढ़ बचाने में जुटी सपा

लोकसभा 2024 के नतीजों से उत्साहित समाजवादी पार्टी जहां अपने इस पुराने गढ़ में 2022 से भी बेहतर प्रदर्शन दोहराने की रणनीति बना रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) गैर-यादव ओबीसी (लोधी, बघेल, निषाद, कुशवाहा) और गैर-जाटव दलित मतदाताओं को जोड़कर सपा के किले में सेंध लगाने की तैयारी में जुट गई है। दोनों ही प्रमुख दल बूथ स्तर पर सांगठनिक मजबूती के जरिए 2027 के रण की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।