उन्नाव की 6 सीटों का सियासी समीकरण, क्या सपा भेद पाएगी BJP का किला?

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लखनऊ और कानपुर के बीच स्थित उन्नाव जिला अपनी राजनीतिक गतिविधियों के चलते हमेशा प्रदेश की सियासत के केंद्र में रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिले की सभी छह सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज करते हुए विपक्ष का खाता तक नहीं खुलने दिया था। अब 2027 के विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट के बीच जिले की बांगरमऊ, सफीपुर, मोहान, उन्नाव सदर, भगवंतनगर और पुरवा सीटों पर नए सियासी समीकरण आकार लेने लगे हैं। समाजवादी पार्टी (SP) जहां संगठन को मजबूत कर अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटी है, वहीं भाजपा अपने दबदबे को बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है।

2022 का जनादेश: छह सीटों पर भाजपा का परचम

पिछले विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी:

  • उन्नाव (सदर): भाजपा के पंकज गुप्ता ने सपा के अभिनव कुमार को करीब 31 हजार वोटों से हराया। इस सीट पर कांग्रेस ने चर्चित दुष्कर्म पीड़िता की मां आशा सिंह को प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वे मुख्य मुकाबले में जगह नहीं बना सकीं।

  • बांगरमऊ: पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दुष्कर्म मामले में सजा मिलने और सदस्यता रद्द होने के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने यह सीट जीती थी। 2022 में पार्टी के श्रीकांत कटियार ने सपा के मुन्ना अल्वी को करीब 16 हजार मतों से मात देकर कब्जा बरकरार रखा।

  • सफीपुर (सुरक्षित): जिले की एकमात्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट पर भाजपा के बंबा लाल दिवाकर ने सपा प्रत्याशी सुधीर रावत को 34 हजार से अधिक मतों से पराजित किया।

  • मोहान: भाजपा के ब्रजेश कुमार ने सपा की डॉ. अंचल वर्मा को भारी मतों से हराया।

  • भगवंतनगर: भाजपा के आशुतोष शुक्ला ने सपा के अंकित परिहार को करीब 43 हजार वोटों के बड़े अंतर से मात दी, जो जिले में जीत का सबसे बड़ा अंतर रहा।

  • पुरवा: भाजपा के अनिल सिंह ने सपा के वरिष्ठ नेता उदयराज को करीब 31 हजार मतों से शिकस्त दी।

पुरवा और मोहान का दिलचस्प चुनावी इतिहास

जिले की राजनीति का इतिहास देखें तो पुरवा सीट लंबे समय तक कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही, जहां से रामधीन सिंह और गया सिंह जैसे दिग्गज कई बार निर्वाचित हुए। बाद में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित भी अलग-अलग दलों से यहां जीते। 1993 से 2012 तक लगातार पांच बार सपा के उदयराज यादव ने इस सीट पर जीत दर्ज की। 2017 में बसपा के टिकट पर जीते अनिल सिंह ने सपा का यह गढ़ तोड़ा और बाद में भाजपा में शामिल होकर 2022 में दोबारा विधानसभा पहुंचे।

मोहान सीट का रिकॉर्ड भी अनूठा है। आजादी के बाद से अब तक हुए 17 विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को इस सीट पर कभी भी जीत नसीब नहीं हुई है। पूरे जिले की बात करें तो 2017 के चुनाव में भाजपा ने पांच सीटें जीती थीं, जबकि बांगरमऊ सीट बसपा के खाते में गई थी, जिसके विधायक बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे।

ग्रामीण पृष्ठभूमि और स्थानीय मुद्दे

2011 की जनगणना के अनुसार उन्नाव जिले की कुल आबादी करीब 31.10 लाख है, जिसमें 16.36 लाख पुरुष और 14.74 लाख महिलाएं हैं। जिले का लिंगानुपात प्रति हजार पुरुषों पर 901 महिलाएं और कुल साक्षरता दर 68 प्रतिशत (पुरुष 75%, महिला 57%) है। धार्मिक आबादी के लिहाज से जिले में करीब 88 प्रतिशत हिंदू और 12 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।

जिले की 83 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में और महज 17 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्र में निवास करती है। आगामी चुनाव में स्थानीय स्तर पर लोनी नदी में प्रदूषण, खस्ताहाल सड़कें, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दे चुनावी चर्चाओं के केंद्र में रहने की संभावना है।

सीटवार जातीय समीकरण

उन्नाव जिले की सभी विधानसभा सीटों पर सामाजिक ताना-बाना चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाता है:

  • उन्नाव (सदर): सामान्य वर्ग और वैश्य समाज का प्रभाव अधिक है। दलित और पिछड़ा वर्ग भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

  • बांगरमऊ: ठाकुर और पिछड़ी जातियों का दबदबा माना जाता है। साथ ही मुस्लिम मतदाता भी यहां प्रभावी स्थिति में हैं।

  • सफीपुर (सुरक्षित): दलित मतदाता सबसे बड़ा समूह हैं। इसके बाद ब्राह्मण और पिछड़ा वर्ग के मतदाता परिणाम तय करते हैं।

  • मोहान: इस विधानसभा क्षेत्र में ठाकुर और ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या अधिक मानी जाती है।

  • भगवंतनगर: यहां मुख्य मुकाबला पिछड़ा वर्ग और सामान्य श्रेणी के मतदाताओं के रुझान पर टिका रहता है।

  • पुरवा: किसी एक जाति का स्पष्ट वर्चस्व नहीं है। क्षेत्र में करीब 50 हजार ब्राह्मण मतदाताओं के साथ ठाकुर, पिछड़ा वर्ग, दलित और मुस्लिम आबादी का मिलाजुला समीकरण काम करता है।