सुल्तानपुर की विधानसभा सीटों का सियासी समीकरण, BJP-सपा में कांटे की टक्कर
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी जमीनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। राज्य की राजनीति में सुल्तानपुर जिले का इतिहास बेहद अहम माना जाता है। जिले की प्रमुख विधानसभा सीटों—सुलतानपुर (सदर), इसौली, लम्भुआ और कादीपुर (सुरक्षित)—पर जातीय और सियासी समीकरण हर चुनाव में नए रंग दिखाते हैं। 2022 के चुनाव में जहां कुछ सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपना दबदबा कायम रखा, वहीं समाजवादी पार्टी (SP) ने भी अपने पारंपरिक गढ़ को बचाने में सफलता पाई।
सुल्तानपुर (सदर): सत्ता का रुख तय करने वाली सीट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सुल्तानपुर सीट (परिसीमन से पहले जयसिंहपुर) के बारे में एक पुरानी कहावत है कि जो दल यहां से जीतता है, लखनऊ में सरकार उसी की बनती है। 1977 से 1993 तक यह ट्रेंड लगातार देखने को मिला। 2017 के चुनाव में मोदी लहर के बीच भाजपा प्रत्याशी सूर्यभान सिंह ने 86,786 वोट हासिल कर प्रचंड जीत दर्ज की थी, जबकि बसपा के मुजीब अहमद 54,393 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे।
2022 के चुनाव में इस सीट पर मुकाबला बेहद करीबी हो गया। भाजपा के विनोद सिंह ने समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता अनूप सांडा को मात्र 1,009 वोटों के बारीक अंतर से हराकर सीट पर पार्टी का कब्जा बरकरार रखा। इससे पहले 2007 और 2012 के चुनावों में अनूप सांडा ने सपा के टिकट पर लगातार दो बार यहां से जीत का परचम लहराया था।
इसौली: सपा का अभेद्य किला, 2022 में 269 वोटों का रोमांचक मुकाबला
सुल्तानपुर जिले की इसौली विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी का ऐसा मजबूत गढ़ है, जिसे 2002 से अब तक कोई भी विरोधी दल भेद नहीं पाया है। सपा ने यहां लगातार पांच बार (2002, 2007, 2012, 2017 और 2022) जीत दर्ज की है। इसौली में लगभग 80 हजार मुस्लिम और 40 हजार से अधिक यादव मतदाता सपा की सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं।
2002 और 2007 में चंद्रभद्र सिंह ‘सोनू’ ने सपा के टिकट पर यहां से जीत की नींव रखी थी। 2012 और 2017 में अबरार अहमद विधायक चुने गए। 2022 का चुनाव इसौली में पूरे राज्य के सबसे रोमांचक मुकाबलों में से एक रहा। सपा के मोहम्मद ताहिर खान ने भाजपा के ओम प्रकाश पांडे ‘बजरंगी’ को महज 269 वोटों के बेहद सूक्ष्म अंतर से मात दी। सवर्ण और गैर-यादव ओबीसी के ध्रुवीकरण के चलते भाजपा यहां जीत के बेहद करीब पहुंच गई थी।
लंभुआ: क्षत्रिय-ब्राह्मण बहुल सीट पर बदलती रहती है सत्ता
2008 के परिसीमन से पहले ‘चांदा’ के नाम से पहचानी जाने वाली लंभुआ विधानसभा सीट पर ठाकुर और ब्राह्मण प्रत्याशियों का पारंपरिक दबदबा रहा है। 1974 से 2022 तक 13 में से 6 बार क्षत्रिय और 5 बार ब्राह्मण नेताओं ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है।
इस सीट पर किसी एक दल का स्थायी वर्चस्व नहीं रहा है। 2012 में सपा के संतोष पांडे ने बसपा के विनोद सिंह को 17,372 वोटों से हराया था। 2017 में भाजपा के देवमणि द्विवेदी ने 78,627 वोट पाकर 12,903 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। 2022 में भाजपा ने प्रत्याशी बदलते हुए सीताराम वर्मा को मैदान में उतारा, जिन्होंने 82,999 वोट हासिल कर सपा के संतोष पांडे को 9,533 मतों से शिकस्त दी।
कादीपुर (सुरक्षित): बसपा का पूर्व गढ़, अब भाजपा-सपा में सीधी टक्कर
कादीपुर अनुसूचित जाति (SC) के लिए सुरक्षित सीट है, जहां दलित मतदाताओं की संख्या 26 प्रतिशत से अधिक है। इसके अलावा मौर्य, यादव, निषाद और कुर्मी मतदाता भी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यह सीट कभी बसपा का अभेद्य किला मानी जाती थी, जहां 1993, 2002 और 2007 में भगेलू राम विधायक चुने गए थे।
2012 में सपा के रामचन्द्र चौधरी ने 97,283 वोट हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन 2017 से यहां के सियासी समीकरण पूरी तरह बदल गए। 2017 में भाजपा के राजेश कुमार गौतम ने बसपा के भगेलू राम को 26,604 वोटों से हराया। 2022 के चुनाव में भगेलू राम सपा के टिकट पर मैदान में उतरे, लेकिन भाजपा के राजेश गौतम ने 96,405 वोट हासिल कर उन्हें 25,723 वोटों से दोबारा शिकस्त दी।
2024 के लोकसभा चुनाव में सुल्तानपुर सीट पर सपा के रामभुआल निषाद ने भाजपा की मेनका गांधी को हराकर बड़ा उलटफेर किया था। इस नतीजे के बाद 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी अपने ‘PDA’ फॉर्मूले के जरिए कादीपुर सहित जिले की अन्य सीटों पर खोई जमीन वापस पाने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि भाजपा अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए माइक्रो-मैनेजमेंट में जुटी है।
