BSP News: संसद के दोनों सदनों से बाहर होगी मायावती की पार्टी? जानें पूरा मामला

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BSP News: बहुजन समाज पार्टी यानी BSP के लिए मौजूदा समय बेहद अहम है। पार्टी की संसद में मौजूदगी अब खत्म होने की स्थिति में पहुंच गई है।

लोकसभा में BSP का अभी कोई सांसद नहीं है। वहीं राज्यसभा में पार्टी के पास सिर्फ एक सांसद रामजी गौतम हैं। उनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म हो रहा है। उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर 16 अक्टूबर को चुनाव होना है। मौजूदा विधानसभा संख्या के हिसाब से BSP के पास अपनी सीट बनाए रखने के लिए पर्याप्त विधायक नहीं हैं।

अगर चुनाव के बाद BSP का कोई सांसद राज्यसभा में नहीं पहुंचता है, तो 1989 में संसद में पहुंचने के बाद यह पहली बार होगा जब पार्टी दोनों सदनों में प्रतिनिधित्व के बिना होगी।

कभी यूपी की सत्ता पर थी BSP की मजबूत पकड़

BSP की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की थी। पार्टी का मुख्य राजनीतिक आधार दलित और वंचित वर्गों को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने की राजनीति रहा है।

उत्तर प्रदेश में एक समय BSP की मजबूत पकड़ थी। 2007 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं।

लेकिन इसके बाद पार्टी का चुनावी प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया।

2012 से शुरू हुआ विधानसभा में गिरावट का दौर

2012 के यूपी विधानसभा चुनाव को BSP के लिए बड़ा राजनीतिक मोड़ माना जाता है।

इस चुनाव में पार्टी 206 सीटों से घटकर 80 सीटों पर आ गई। इसके साथ ही मायावती की सरकार चली गई।

इसके बाद विधानसभा में BSP का आंकड़ा और नीचे जाता गया। अगस्त 2026 में बलिया की रसड़ा सीट से BSP के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह का निधन हो गया। इसके बाद 403 सदस्यीय यूपी विधानसभा में पार्टी का कोई विधायक नहीं रह गया।

राज्यसभा में भी अब बची है सिर्फ एक सीट

BSP के लिए अगली बड़ी चुनौती राज्यसभा की है।

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को चुनाव होना है। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को पूरा होगा।

इनमें BSP के रामजी गौतम भी शामिल हैं। पार्टी के पास यूपी विधानसभा में कोई विधायक नहीं है। इसलिए मौजूदा चुनावी गणित में BSP के लिए अपने दम पर राज्यसभा सीट हासिल करना संभव नहीं दिखता।

यानी चुनाव के बाद BSP की राज्यसभा में भी मौजूदगी खत्म हो सकती है।

2014 में लोकसभा से खाली हुए थे हाथ

राष्ट्रीय राजनीति में BSP के कमजोर होने का बड़ा दौर 2014 के लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ।

2009 में BSP ने लोकसभा की 21 सीटें जीती थीं। लेकिन 2014 में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी।

उत्तर प्रदेश में उस चुनाव में BJP ने 80 में से 71 सीटें जीती थीं। BSP की सीटें शून्य रह गईं।

2019 में मिली थी कुछ राहत

2019 के लोकसभा चुनाव में BSP ने समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन किया था।

इस चुनाव में BSP ने 10 सीटें जीतीं। इससे पार्टी को संसद में फिर से जगह मिली।

लेकिन यह वापसी लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी।

2024 के लोकसभा चुनाव में BSP ने अकेले चुनाव लड़ा। पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। इसके बाद लोकसभा में उसका प्रतिनिधित्व फिर शून्य हो गया।

अब सवाल BSP के पारंपरिक वोट बैंक का

BSP के लगातार कमजोर होते चुनावी प्रदर्शन के बीच उसके पारंपरिक वोट बैंक को लेकर भी चर्चा होती रही है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। खासकर जाटव समुदाय को BSP का पारंपरिक आधार माना जाता रहा है।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी जैसे दल दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में BSP के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं है। उसे अपने पुराने सामाजिक और राजनीतिक आधार को भी बनाए रखना है।

राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर भी नजर

BSP के सामने एक और अहम सवाल राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता का है।

चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक किसी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मान्यता पाने के लिए तय शर्तों में से कम से कम एक पूरी करनी होती है।

इनमें प्रमुख शर्तें हैं:

  • कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में 6 फीसदी वैध वोट और कम से कम चार लोकसभा सीटें।
  • लोकसभा की कम से कम 2 फीसदी सीटें जीतना और ये सीटें कम से कम तीन राज्यों से होना।
  • कम से कम चार राज्यों में राज्य पार्टी के तौर पर मान्यता प्राप्त होना।

2027 से पहले BSP के सामने कई सवाल

BSP के लिए अब 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

पार्टी के सामने एक तरफ संसद में वापसी की चुनौती है। दूसरी तरफ विधानसभा में अपना राजनीतिक आधार दोबारा खड़ा करने का सवाल है।

इसके अलावा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने के लिए भी चुनावी प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहेगा।

यानी आने वाले चुनाव BSP के लिए सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं होंगे। पार्टी को अपने पुराने जनाधार, संगठन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी आगे की रणनीति तय करनी होगी।