‘इस्लामिक NATO’ फेल! संकट के समय सऊदी अरब को पाकिस्तान ने दिया गच्चा, हूतियों के हमले पर मिला सिर्फ ‘जुबानी साथ’
सऊदी अरब ने बुरे वक्त में रक्षात्मक मदद की उम्मीद के साथ पाकिस्तान और तुर्की के साथ मिलकर ‘मक्का समझौता’ (Mecca Agreement) किया था। ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ की तर्ज पर हुई इस डील को दुनिया ने ‘इस्लामिक नाटो’ (Islamic NATO) का नाम दिया था। लेकिन, आज जब सऊदी अरब वास्तव में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) के गंभीर हमलों से जूझ रहा है, तो पाकिस्तान ने उसे गच्चा दे दिया है। मुश्किल की इस घड़ी में सऊदी को पाकिस्तान की तरफ से जमीनी हथियारों के बजाय सिर्फ ‘जुबानी साथ’ ही मिल रहा है।
कूटनीतिक मदद का राग, सैन्य मोर्चे पर साधी चुप्पी
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बुधवार को जियो न्यूज के एक कार्यक्रम में कहा कि हालात बिगड़ने पर पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब का ‘व्यावहारिक और कूटनीतिक’ रूप से साथ देगा।
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पाकिस्तान अभी भी खुलकर हथियारों या सैन्य बलों के साथ सऊदी की मदद करने का कोई ठोस ऐलान नहीं कर रहा है।
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हूतियों के साथ किसी सैन्य या राजनीतिक बातचीत के सवाल से बचते हुए आसिफ ने कहा कि इस स्तर की रणनीतियों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
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जमीनी हकीकत यह है कि पाकिस्तान की इस देरी और टालमटोल के बीच हूती विद्रोही लगातार मजबूत हो रहे हैं और सऊदी अरब के अहम तेल व्यापार को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
‘मक्का की रक्षा के लिए किसी समझौते की जरूरत नहीं’
हाल ही में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दावा किया था कि हूतियों ने पवित्र शहर मक्का की ओर एक ड्रोन भेजा था, जिसे हवा में ही मार गिराया गया (हालांकि हूतियों ने इसे झूठ बताया था)। इस घटनाक्रम पर पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने सफाई देते हुए कहा:
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त्रिपक्षीय मक्का समझौते के तहत, अगर किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता पर खतरा आता है, तो बाकी दो देश उसकी रक्षा के लिए कदम उठाएंगे और अब वैसी ही स्थिति आ गई है।
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आसिफ ने स्पष्ट किया कि अगर मक्का या मदीना जैसे पवित्र स्थलों पर कोई हमला होता है, तो कार्रवाई के लिए दुनिया भर के मुसलमानों या पाकिस्तान को किसी भी कागजी समझौते की जरूरत नहीं है; यह उनका धार्मिक कर्तव्य है।
ईरान को दी ‘क्लीन चिट’
हूतियों को ईरान से मिल रहे कथित समर्थन के मुद्दे पर ख्वाजा आसिफ ने नरम रुख अपनाते हुए एक तरह से ईरान का बचाव किया। उन्होंने दावा किया कि एक देश के तौर पर ईरान शायद इस गुट का समर्थन नहीं कर रहा होगा, क्योंकि वह पहले से ही मिडिल ईस्ट के अन्य संघर्षों में उलझा हुआ है। आसिफ के मुताबिक, ईरान अगर हूतियों का पक्ष लेता है तो यह उसकी कूटनीतिक भूल होगी, और इस संघर्ष को किसी और क्षेत्र तक बढ़ाना समझदारी भरा फैसला नहीं है।
