जाति-धर्म से आगे निकला यूपी का जेन-जी, 2 करोड़ युवा वोटरों के एजेंडे पर नौकरियां और परीक्षा सुधार
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात पर इस बार सबसे बड़ा और निर्णायक कारक राज्य की युवा आबादी बनने जा रही है। प्रदेश के कुल मतदाताओं में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के ‘जेन-जी’ (Gen-Z) वोटरों की हिस्सेदारी करीब 15 से 21 प्रतिशत के बीच है। लगभग दो करोड़ की संख्या वाला यह युवा मतदाता वर्ग प्रयागराज के कोचिंग संस्थानों से लेकर नोएडा के आईटी दफ्तरों और पूर्वांचल के ग्रामीण अंचलों तक फैला हुआ है। यह पीढ़ी पारंपरिक सियासी नारों और जातीय खांचों से अलग अपने भविष्य के लिए ठोस नीतिगत रोडमैप की मांग कर रही है।

रोजगार, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं पर कड़े सवाल
मीनल चौहान कहती हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच बेरोजगारी, पेपर लीक, परीक्षाओं का रद्द होना और भर्ती परिणामों में होने वाली देरी सबसे बड़ा असंतोष बनकर उभरी है। प्रयागराज, कानपुर और लखनऊ जैसे प्रमुख शिक्षा केंद्रों में यह रोष साफ तौर पर देखा जा सकता है।
युवाओं के सवाल अब केवल खाली पदों की घोषणा तक सीमित नहीं हैं। उनकी प्राथमिकताओं में स्पष्ट परीक्षा कैलेंडर, नकल-मुक्त और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, समयबद्ध परिणाम और निश्चित समयसीमा में नियुक्ति पत्र शामिल हैं। इसके साथ ही निजी क्षेत्र में कौशल विकास (Skill Development), स्टार्टअप इकोसिस्टम और डिजिटल रोजगार के वास्तविक अवसरों को लेकर भी युवाओं में गहरी अपेक्षाएं हैं।

शिक्षा व्यवस्था और बढ़ती महंगाई की दोहरी चुनौती
अपूर्वा त्रिपाठी कहती हैं, विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, योग्य शिक्षकों की भारी कमी और बढ़ती कोचिंग संस्कृति ने शिक्षण व्यवस्था पर युवाओं के भरोसे को प्रभावित किया है। छात्र ऐसी रोजगारोन्मुखी शिक्षा चाहते हैं जो उन्हें आधुनिक तकनीकी जरूरतों के अनुरूप तैयार कर सके।
इसके साथ ही पेट्रोल, कमरे का किराया, प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म, अध्ययन सामग्री, कोचिंग फीस और मोबाइल डेटा जैसे रोजमर्रा के खर्चों में हुई बढ़ोतरी ने छात्रों और उनके परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ाया है। भविष्य की इसी असुरक्षा ने युवा वर्ग को मुद्दों के आधार पर राजनीतिक रूप से मुखर कर दिया है।

पारंपरिक जातीय ध्रुवीकरण से दूरी और सोशल मीडिया का असर
अमन तिवारी कहते हैं, पूर्ववर्ती पीढ़ियों के मुकाबले राज्य का जेन-जी मतदाता जाति और धर्म के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों से अपेक्षाकृत कम बंधा दिखता है। सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और ऑनलाइन विमर्श के जरिए अपनी राय बनाने वाली यह पीढ़ी कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की सराहना जरूर करती है, लेकिन इसे रोजगार और शिक्षा की जगह प्राथमिक मुद्दा नहीं मानती। अपने परिवारों के मतदान के रुख को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले इन युवाओं का फोकस सीधे तौर पर अपनी प्रगति और अवसरों पर है।
राजनीतिक दलों का रुख और दांव युवा मतदाताओं की इस निर्णायक ताकत को देखते हुए सभी प्रमुख दलों ने अपने नैरेटिव में बदलाव शुरू किया है:
-
भाजपा: पार्टी युवा सलाहकार समितियों, उद्यमिता योजनाओं, स्किल इनिशिएटिव और डिजिटल आउटरीच पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
-
समाजवादी पार्टी: सपा ने रोजगार की कमी, पेपर लीक के मामलों और युवाओं के असंतोष को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया हुआ है।
-
कांग्रेस और बसपा: कांग्रेस ‘कैंपस कनेक्ट’ और उच्च शिक्षा सुधारों के जरिए छात्रों के बीच पैठ बनाने में जुटी है, जबकि बहुजन समाज पार्टी भी नई पीढ़ी के युवाओं को तरजीह देने की रणनीति पर बात कर रही है।
प्रयागराज में सिविल सेवा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे अभ्यर्थी, नोएडा के निजी संस्थानों में कार्यरत युवा और गांवों में तकनीकी अवसरों की तलाश कर रहे ग्रामीण छात्र—तीनों की पृष्ठभूमि भले अलग हो, लेकिन पारदर्शी भर्तियों और निश्चित रोजगार का साझा मुद्दा 2027 के चुनाव में राजनीतिक दलों के दावों की सबसे बड़ी कसौटी बनने जा रहा है।
