September 16, 2026

राघव चड्ढा वोटर लिस्ट विवाद: क्या पंजाब में वोट न होने पर भी बच जाएगी राज्यसभा सदस्यता?

raghav chadha

बीजेपी सांसद राघव चड्ढा का नाम पंजाब की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए जाने के बाद अब दिल्ली की मतदाता सूची में दर्ज कर लिया गया है। पंजाब में 13 अगस्त को स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान उनका नाम ‘स्थाई रूप से स्थानांतरित’ श्रेणी में डाला गया था। इसके बाद आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं ने दावा किया था कि वोटर लिस्ट से नाम कटने के कारण चड्ढा की राज्यसभा सदस्यता खत्म हो सकती है। हालांकि, 26 अगस्त को फॉर्म-6 के जरिए दिए गए आवेदन के आधार पर 2 सितंबर को दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने उन्हें दिल्ली का पंजीकृत मतदाता मान लिया है।

राजनीतिक बदले का आरोप और AAP का पक्ष

पंजाब की वोटर लिस्ट से नाम कटने पर राघव चड्ढा ने राज्य की आम आदमी पार्टी सरकार पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाया। आम आदमी पार्टी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे चुनाव आयोग की एक नियमित प्रक्रिया बताया और कहा कि चड्ढा खुद दिल्ली में रहते हैं। आप नेता सौरभ भारद्वाज ने दावा किया था कि मतदाता सूची में नाम न होने से उनकी राज्यसभा सीट जा सकती है।

राघव चड्ढा 2022 में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में पंजाब से निर्विरोध राज्यसभा पहुंचे थे। नामांकन में दिए गए हलफनामे के मुताबिक, वे पहले दिल्ली के राजेंद्र नगर के मतदाता थे, जिसे उन्होंने बाद में पंजाब स्थानांतरित कराया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मोहाली में मतदान किया था। पार्टी नेतृत्व से मतभेदों का हवाला देते हुए उन्होंने बाद में आप छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। अब उनका नाम वापस दिल्ली की लिस्ट में जुड़ गया है।

क्या बिना स्थानीय वोट के राज्यसभा सांसद बन सकते हैं?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह कानूनी सवाल उठा कि क्या कोई व्यक्ति बिना किसी राज्य का पंजीकृत मतदाता हुए वहां का प्रतिनिधित्व राज्यसभा में कर सकता है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 3 के तहत 2003 से पहले यह अनिवार्य था कि राज्यसभा का उम्मीदवार उसी राज्य का वोटर हो।

2003 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस नियम में संशोधन किया और “उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में” शब्द की जगह “भारत में” शब्द जोड़ दिया। सरकार का तर्क था कि नेता अक्सर इस नियम को पूरा करने के लिए फर्जी पते का सहारा लेते हैं। तत्कालीन कानून राज्य मंत्री पी.सी. थॉमस ने संसद में कहा था कि राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को किसी भी राज्य से चुने जाने का अवसर मिलना चाहिए।

डॉ. मनमोहन सिंह का उदाहरण और सुप्रीम कोर्ट का आदेश

2003 के संशोधन से पहले नेताओं को संबंधित राज्य का अस्थायी पता देना पड़ता था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में असम से राज्यसभा जाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया के गुवाहाटी स्थित घर का एक हिस्सा किराये पर लेकर खुद को वहां का वोटर बनवाया था। वे 2019 तक उसी पते से असम के मतदाता बने रहे।

2003 के इस कानून को वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि स्थानीय निवासी होने की शर्त खत्म करने से राज्यसभा का संघीय स्वरूप कमजोर होगा। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में इस याचिका को खारिज करते हुए संसद के संशोधन को सही ठहराया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान में राज्यसभा सदस्य के लिए संबंधित राज्य का निवासी होना अनिवार्य नहीं है। राज्य के विधायक जिसे चुनकर संसद भेजते हैं, वही उस राज्य का प्रतिनिधि होता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले और 2003 के संशोधन के आधार पर कानूनी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है कि दिल्ली की वोटर लिस्ट में नाम होने के बावजूद राघव चड्ढा की पंजाब से राज्यसभा सदस्यता पर कोई कानूनी असर नहीं पड़ेगा।