भारत और UK की Fanta में इतना फर्क? चीनी से लेकर Warning Label तक
नई दिल्ली: लंदन के किसी स्टोर से Fanta की बोतल उठाइए और फिर भारत में बिकने वाली उसी ब्रांड की Fanta देखिए। नाम और पैकेजिंग लगभग एक जैसी हो सकती है, लेकिन दोनों देशों में बिकने वाले प्रोडक्ट की सामग्री को लेकर बड़ा अंतर सामने आया है। Reuters की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बिकने वाली Fanta में ब्रिटेन की Fanta की तुलना में चीनी की मात्रा ज्यादा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ ऐसे खाद्य रंग, जिनके इस्तेमाल को लेकर यूरोप में उपभोक्ताओं को प्रमुख चेतावनी दी जाती है, उनकी जानकारी भारत में पैकेज के पीछे दी जाती है।
मामला सिर्फ Fanta तक सीमित नहीं है। पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स में ज्यादा चीनी, नमक और फैट को लेकर भारत में सामने की तरफ Warning Label लगाने की मांग लंबे समय से चल रही है। Reuters के मुताबिक, इस प्रस्ताव का उद्योग जगत की बड़ी कंपनियों ने विरोध किया है और अब इससे जुड़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।
कंपनियों ने Warning Label का विरोध क्यों किया?
भारत में ज्यादा नमक, चीनी और फैट वाले पैकेज्ड फूड पर सामने की तरफ स्पष्ट Warning Label लगाने की कोशिश कई साल से चल रही है।
Reuters के मुताबिक, मार्च 2026 में हुई एक बैठक में कई बड़ी कंपनियों ने ऐसे Warning Label का विरोध किया। कंपनियों का तर्क था कि केवल पैकेट पर कोई सिंबल लगाने से लोगों की खानपान की आदतें नहीं बदलेंगी। उनके मुताबिक, उपभोक्ताओं को Portion Control, यानी कम मात्रा में खाने के लिए जागरूक करना ज्यादा प्रभावी तरीका हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इनमें से कुछ कंपनियां यूरोप के अलग-अलग बाजारों में ऐसे लेबलिंग सिस्टम का इस्तेमाल करती हैं।
मामले में हेल्थ एक्टिविस्ट की ओर से मांग की गई है कि भारत में भी ज्यादा चीनी, नमक और फैट वाले उत्पादों पर सामने की तरफ स्पष्ट चेतावनी दी जाए। मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और FSSAI से जवाब मांगा है।
Fanta के अलावा KitKat, Maggi और Cerelac भी चर्चा में
Reuters की रिपोर्ट में Fanta के साथ दूसरे मल्टीनेशनल ब्रांड्स के उत्पादों का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अलग-अलग देशों में एक ही ब्रांड के प्रोडक्ट की रेसिपी अलग हो सकती है।
कंपनियां आम तौर पर इसके पीछे स्थानीय नियम, उपभोक्ताओं की पसंद और कीमत जैसे कारण बताती हैं। लेकिन भारत में इन उत्पादों की तुलना दूसरे देशों में बिकने वाले समान ब्रांड्स से किए जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं।
रिपोर्ट में KitKat, Maggi और Cerelac जैसे उत्पादों का उदाहरण दिया गया है। सोशल मीडिया पर Food Pharmer के नाम से पहचाने जाने वाले रेवंत हिमतसिंघका भी लंबे समय से अलग-अलग देशों में बिकने वाले उत्पादों की तुलना करते रहे हैं।
Reuters के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाली KitKat में कोको की मात्रा भारतीय KitKat से ज्यादा बताई गई है। वहीं भारत में बिकने वाली Maggi में पाम ऑयल इस्तेमाल होने और ब्रिटेन में बिकने वाले कुछ वेरिएंट में सनफ्लावर ऑयल इस्तेमाल किए जाने का भी रिपोर्ट में उल्लेख है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ब्रिटेन में बिकने वाले कुछ Maggi पैकेट भारत में ही बनाए जाते हैं, लेकिन वहां पैकेज के सामने नमक की मात्रा को लेकर चेतावनी दी जाती है।
करीब 20 देशों में लागू हैं अलग तरह के Warning System
Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के करीब 20 देशों में पैकेज्ड फूड पर सामने की तरफ अलग-अलग तरह के Warning Label सिस्टम लागू हैं। कुछ देशों में लाल रंग के संकेत इस्तेमाल किए जाते हैं, जबकि कुछ जगह Traffic Light मॉडल अपनाया गया है।
इसका उद्देश्य उपभोक्ता को खरीदारी से पहले यह समझने में मदद करना है कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या फैट की मात्रा कितनी है।
भारत में फिलहाल पैकेज्ड फूड की Nutrition और Ingredients से जुड़ी जानकारी आम तौर पर पैकेट पर दी जाती है। Warning Label को लेकर नियामक स्तर पर चल रही बहस में उद्योग और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के अलग-अलग तर्क हैं।
मोटापे के बढ़ते खतरे का भी दिया जा रहा हवाला
पैकेज्ड फूड की लेबलिंग पर बहस ऐसे समय चल रही है जब भारत में मोटापे और ज्यादा वजन की समस्या को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
Reuters की रिपोर्ट में एक स्टडी के हवाले से कहा गया है कि 2050 तक भारत में करीब 45 करोड़ लोग ओवरवेट या मोटापे की समस्या से जूझ सकते हैं।
इसी वजह से हेल्थ एक्टिविस्ट पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट और आसानी से दिखाई देने वाली स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, खाद्य उद्योग Portion Control और उपभोक्ता जागरूकता पर जोर दे रहा है।
अब इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार और FSSAI का जवाब महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल मामला केवल किसी एक सॉफ्ट ड्रिंक की रेसिपी या लेबलिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में पैकेज्ड फूड की Front-of-Pack Warning Labeling व्यवस्था को लेकर नियामकीय बहस का हिस्सा बन चुका है।
