‘डोनबास नहीं जीता तो मुझे फांसी देंगे’, पुतिन के डर का खुलासा
बिश्केक: SCO शिखर सम्मेलन के मंच से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भले ही दुनिया के सामने ‘अपनी जीत’ का भरोसा जताया हो, लेकिन रूसी सत्ता के भीतरी गलियारों से एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आ रही है। पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुतिन को यूक्रेन युद्ध हारने से ज्यादा इस बात का खौफ है कि अगर उन्होंने पूरे डोनबास क्षेत्र पर कब्जा किए बिना यह युद्ध खत्म किया, तो उनके ही करीबी लोग उन्हें ‘फांसी पर लटका देंगे।’
‘द इकोनॉमिस्ट’ मैगजीन ने 31 अगस्त 2026 को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट ‘कॉर्नर्ड: व्लादिमीर पुतिन प्लान्स टू एस्केलेट हिज वॉर’ में इसका खुलासा किया है। क्रेमलिन से जुड़े सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि पुतिन ने अपने निजी दायरे में सबसे करीबी लोगों के सामने यह डर व्यक्त किया था। यह खुलासा बताता है कि रूसी राष्ट्रपति अपनी ही सत्ता और सिस्टम के उस जाल में फंस चुके हैं, जहां असफलता के लिए कोई माफी नहीं है।
रूसी सिस्टम में क्यों है ‘फांसी’ का डर?
रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन का यह डर सीधे तौर पर उनके राजनीतिक और शारीरिक अस्तित्व से जुड़ा है। रूसी सत्ता व्यवस्था की मूलभूत तर्कशक्ति यह है कि ‘कभी कमजोरी मत दिखाओ।’ यह सिस्टम हिंसा को तो आसानी से सहन कर लेता है, लेकिन असफलता को स्वीकार नहीं करता।
रूस के ताकतवर लोगों—जिनके पास पैसा, हथियार और सत्ता तक पहुंच है—के बीच अगर यह संदेश गया कि पुतिन कमजोर पड़ गए हैं, तो उनके खिलाफ गहरी नाराजगी भड़क सकती है। डोनबास पर पूरा कब्जा किए बिना युद्ध रोकने को एक स्पष्ट असफलता माना जाएगा, जिससे पुतिन की सत्ता और जान दोनों खतरे में आ सकती हैं।
डोनबास क्यों बना पुतिन के लिए ‘जीवन-मरण’ का सवाल
यूक्रेन के डोनेत्स्क और लुहांस्क क्षेत्रों को मिलाकर बना डोनबास सबसे बड़ा औद्योगिक और रूसी-भाषी आबादी का गढ़ है। वर्तमान में रूस का डोनबास के करीब 90% हिस्से पर कंट्रोल है। बचा हुआ 10% हिस्सा ही पुतिन के लिए जीत का वह ‘न्यूनतम पैमाना’ बन गया है, जिसके बिना वह किसी भी तरह अपनी जीत का दावा नहीं कर सकते।
इस क्षेत्र को लेकर रूसी सेना की डेडलाइन लगातार खिसक रही है। फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, वरिष्ठ रूसी कमांडरों ने 13 मई 2026 को पुतिन को भरोसा दिलाया था कि 2026 की सर्दियों तक पूरे डोनबास पर कब्जा हो जाएगा। हालांकि, यूक्रेन के राष्ट्रपति कार्यालय के उप प्रमुख पावलो पालिसा ने 29 अगस्त 2026 को खुलासा किया कि अब रूसी कमांडर इस समयसीमा को 31 मार्च 2027 तक बढ़ाने की लॉबी कर रहे हैं।
एस्टोनियाई खुफिया प्रमुख काउपो रोसिन ने इस स्थिति पर चेतावनी देते हुए कहा है कि रूसी अभिजात वर्ग (Elite) के भीतर अब ‘कुल जीत’ की बात लगभग बंद हो गई है। इसके बजाय, अब वे तेजी से युद्ध को खत्म करने के विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं, जो पुतिन के लिए एक बेहद खतरनाक संकेत है।
युद्ध को खतरनाक स्तर पर ले जाने की तैयारी
अपनी सत्ता को बचाने और जीत हासिल करने के लिए पुतिन ने युद्ध को और अधिक भड़काने (Escalation) का रास्ता चुना है। कीव पोस्ट और द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में रूस की तीन प्रमुख योजनाओं का जिक्र है:
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4 लाख नए सैनिक: पुतिन 4 लाख और रूसियों को युद्ध के मैदान में भेजने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए सितंबर 2022 में हस्ताक्षरित लामबंदी (Mobilization) डिक्री का इस्तेमाल किया जा रहा है। पेंजा इलाके में इसका परीक्षण शुरू हो चुका है, जहां सड़कों से पुरुषों को हिरासत में लेकर जबरन सेना में भर्ती किया जा रहा है।
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हाइब्रिड युद्ध: पश्चिमी खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि रूस अपने हाइब्रिड युद्ध को तेज करते हुए यूरोपीय रक्षा निर्माण सुविधाओं पर तोड़फोड़ और हमले करवा सकता है, हालांकि वह NATO से सीधे टकराव से बचेगा।
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ऊर्जा ढांचे पर प्रहार: आने वाली सर्दियों में यूक्रेन के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर बड़े हवाई हमलों की एक नई लहर शुरू करने की तैयारी है।
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अमेरिकी कूटनीति को कमजोरी समझना: हाल ही में CIA के निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने मॉस्को की सीक्रेट यात्रा की थी। रिपोर्ट के अनुसार, पुतिन ने इसे अमेरिकी झिझक और कमजोरी के लक्षण के रूप में देखा है, ठीक वैसे ही जैसे 2022 के आक्रमण से पहले तत्कालीन CIA निदेशक विलियम बर्न्स की यात्रा को लिया गया था।
रूसी एलीट क्लास में बदलता मूड: ‘सम्राट बिना कपड़ों के है’
रूस के घरेलू मोर्चे पर भी बेचैनी बढ़ रही है। जनता के बीच युद्ध को लेकर जो शुरुआती उदासीनता थी, वह अब असंतोष में बदल रही है। युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर युद्ध-विरोधी संदेश साझा कर रही है और राज्य के प्रोपगैंडा से उनका भरोसा उठ रहा है। लेवाडा सेंटर के आंकड़ों के मुताबिक, 57% रूसी नागरिक देश की वर्तमान स्थिति को ‘तनावपूर्ण’ मानते हैं।
रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू रूसी एलीट क्लास का बदलता रवैया है। अब रूस की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक नुकसान या मोर्चे पर फंसी सेना नहीं, बल्कि तेजी से खत्म हो रहा समय है। रूसी सत्ता के गलियारों में अब हैंस क्रिश्चियन एंडरसन की मशहूर कहानी की तर्ज पर यह माना जाने लगा है कि ‘सम्राट ने कपड़े नहीं पहने हैं।’ यानी रूसी एलीट क्लास इस कड़वी सच्चाई को अंदर ही अंदर स्वीकार कर चुकी है कि यह युद्ध एक नाकामी है और पुतिन के पास दिखाने के लिए कोई ठोस जीत नहीं बची है।
