US मिडटर्म चुनाव: दांव पर ट्रंप के बचे हुए दो साल, कांग्रेस और 36 राज्यों के गवर्नरों का होगा फैसला

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अमेरिका में मंगलवार, 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव (Midterm Elections) के लिए मतदान होने जा रहा है। यह चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों की राजनीतिक दिशा तय करेगा। दांव पर अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के दोनों सदनों का नियंत्रण और 36 राज्यों के गवर्नरों की कुर्सी है। चुनावी सर्वेक्षणों (Polls) में डेमोक्रेट्स को फिलहाल बढ़त मिलती दिख रही है, लेकिन अंतिम नतीजे कुछ दर्जन कड़ी टक्कर वाली सीटों पर निर्भर करेंगे।

रॉयटर्स के आंकड़ों के अनुसार, अगर 2022 के मिडटर्म चुनाव की तरह इस बार भी मतदान हुआ, तो 10 करोड़ से अधिक लोग वोट डालेंगे। 12 अक्टूबर तक इस चुनाव के राजनीतिक विज्ञापनों पर 3.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का रिकॉर्ड खर्च हो चुका है।

मिडटर्म चुनाव में क्या दांव पर है?

अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है। इसके ठीक बीच में (दो साल बाद) मिडटर्म चुनाव होते हैं। इन चुनावों में राष्ट्रपति के लिए वोट नहीं डाले जाते। इसके बजाय, मतदाता कांग्रेस के सदस्यों को चुनते हैं, जो कानून बनाते हैं, बजट पास करते हैं और जजों व कैबिनेट सदस्यों की नियुक्तियों को मंजूरी देते हैं। इसके साथ ही, कई राज्यों के गवर्नर और स्थानीय अधिकारी भी चुने जाते हैं। इन चुनावों को अक्सर मौजूदा राष्ट्रपति के काम पर जनमत संग्रह (referendum) के तौर पर देखा जाता है और आम तौर पर राष्ट्रपति की पार्टी को इसमें नुकसान उठाना पड़ता है।

हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट का गणित

वर्तमान में अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों पर रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण है।

  • हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स: निचले सदन में 435 सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल दो साल का होता है। इसलिए सभी 435 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। फिलहाल रिपब्लिकन के पास 218 और डेमोक्रेट्स के पास 214 सीटें हैं। नियंत्रण हासिल करने के लिए डेमोक्रेट्स को 4 सीटों के शुद्ध लाभ (net gain) की जरूरत है।

  • सीनेट: उच्च सदन में 100 सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल छह साल का होता है। हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होते हैं। इस बार 35 सीटों पर मुकाबला है। रिपब्लिकन के पास 53 और डेमोक्रेट्स के पास 47 सीटें हैं। डेमोक्रेट्स को यहां भी नियंत्रण के लिए 4 सीटों का फायदा चाहिए। यदि सीनेट 50-50 पर बंट जाती है, तो उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस निर्णायक वोट डालेंगे, जिससे रिपब्लिकन का नियंत्रण बना रहेगा।

  • इस साल सीनेट में ओहियो और फ्लोरिडा की दो विशेष सीटों पर भी चुनाव हो रहे हैं, जो जे.डी. वेंस और मार्को रुबियो (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) के पद छोड़ने से खाली हुई हैं।

इसके अलावा, 36 राज्यों में मतदाता नए गवर्नर भी चुनेंगे। इनमें से 15 राज्यों में कोई भी निवर्तमान (incumbent) गवर्नर चुनाव मैदान में नहीं है। अगर डेमोक्रेट्स किसी भी सदन में बहुमत हासिल करते हैं, तो वे ट्रंप के बिलों को रोक सकते हैं और संसदीय समितियों के जरिए उनके प्रशासन के खिलाफ जांच बैठा सकते हैं।

चुनाव कौन करवाता है और नियम क्या हैं?

भारत या अन्य लोकतंत्रों के विपरीत, अमेरिका में चुनाव कराने वाली कोई एक राष्ट्रीय संस्था (जैसे चुनाव आयोग) नहीं है। अमेरिकी संविधान राज्यों को चुनाव कराने का अधिकार देता है। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, देश भर में 10,000 से अधिक अलग-अलग चुनावी क्षेत्राधिकार (jurisdictions) हैं, जो राज्य और स्थानीय नियमों के तहत काम करते हैं।

यही वजह है कि हर जगह नियम अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों में वोटिंग के लिए फोटो आईडी जरूरी है, तो कुछ में नहीं। कुछ राज्य सभी पंजीकृत मतदाताओं को पोस्टल बैलट (Mail ballot) भेजते हैं, जबकि अन्य में इसके लिए वैध कारण बताना पड़ता है। चुनाव सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस विकेंद्रीकृत प्रणाली के कारण बड़े पैमाने पर धांधली करना बेहद मुश्किल है।

हाल ही में ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश के जरिए पोस्टल सर्विस को केवल सरकारी सूची वाले मतदाताओं को ही मेल बैलट देने का निर्देश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी, जिससे मेल वोटिंग पुरानी व्यवस्था के तहत ही होगी।

नतीजे आने में क्यों लगेगी देरी?

चुनाव की रात को ही आधिकारिक नतीजे नहीं आएंगे। मीडिया और एजेंसियां स्थानीय आंकड़ों के आधार पर रुझान बताती हैं। कांटे की टक्कर वाली सीटों के नतीजे आने में कई दिन और आधिकारिक पुष्टि (certification) में हफ्तों लग सकते हैं।

  • पोस्टल बैलट की गिनती: डाक से आए वोटों को खोलने से पहले उनके हस्ताक्षर मिलाए जाते हैं, जिसमें समय लगता है। पेंसिल्वेनिया और विस्कॉन्सिन जैसे स्विंग राज्यों में चुनाव के दिन सुबह से पहले इन लिफाफों को खोलने की मनाही है।

  • देर से पहुंचने वाले वोट: कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में चुनाव के दिन तक पोस्ट किए गए बैलट अगर सात दिन के भीतर भी पहुंचते हैं, तो उनकी गिनती होती है।

  • सुधार का मौका: एरिज़ोना में मतदाताओं को हस्ताक्षर सुधारने के लिए चुनाव के बाद भी पांच दिन का समय मिलता है।

  • रन-ऑफ चुनाव: जॉर्जिया में अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत नहीं मिलता, तो चुनाव ‘रन-ऑफ’ में चला जाता है, जो दिसंबर तक खिंच सकता है।

चुनाव के मुख्य मुद्दे

  • महंगाई: रॉयटर्स/इप्सोस के हालिया सर्वे के मुताबिक, लगभग आधे मतदाताओं के लिए महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है। लोग हेल्थकेयर, पेट्रोल, किराना और आवास की बढ़ती लागत से परेशान हैं।

  • टैरिफ (आयात शुल्क): ट्रंप द्वारा लगाए गए आयात शुल्कों को लेकर भी बहस तेज है। नेशनल टैक्सपेयर्स यूनियन फाउंडेशन के मुताबिक, इन शुल्कों से हर घर पर 820 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा है।

  • इमिग्रेशन: फॉक्स न्यूज़ के सर्वेक्षण के मुताबिक, सीमा सुरक्षा को लेकर मतदाताओं का भरोसा रिपब्लिकन्स पर अधिक है, लेकिन 59 फीसदी लोगों का मानना है कि ट्रंप का डिपोर्टेशन अभियान (deportation drive) चलाने वाली एजेंसी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) का रवैया ज्यादा आक्रामक रहा है।

27 अक्टूबर के पोलचेक औसत के अनुसार, ‘जेनेरिक बैलट’ (कांग्रेस के लिए पार्टी की पसंद) में डेमोक्रेट्स लगभग 8.7 प्रतिशत अंकों से आगे चल रहे हैं। उसी दिन रॉयटर्स/इप्सोस पोल में राष्ट्रपति ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 32 प्रतिशत दर्ज की गई थी।