September 20, 2026

अखिलेश का ब्राह्मण दांव: क्या PDA में ‘पंडित’ जोड़ने से लखनऊ की कुर्सी मिल जाएगी?

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उत्तर प्रदेश की सत्ता से एक दशक से बाहर चल रही समाजवादी पार्टी (SP) वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में किसी भी कीमत पर वापसी की रणनीति तैयार कर रही है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ संकेत दे दिया है कि वह अब केवल पारंपरिक ‘यादव-मुस्लिम-दलित’ समीकरण के भरोसे नहीं रहेंगे। उन्होंने राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावी और कठिन मोर्चे यानी ‘ब्राह्मण वोट बैंक’ पर सीधा दांव चल दिया है।

लखनऊ में जनेश्वर मिश्र की जयंती पर अयोध्या सीट से पूर्व मंत्री पवन पांडे को प्रत्याशी घोषित करना, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सानिध्य में बैठकर “समाजवाद ही सनातन है” का नारा देना और अपने चर्चित PDA फॉर्मूले में ‘P’ का अर्थ ‘पिछड़ा’ के साथ-साथ ‘पंडित’ बताना—यह कोई महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है।

आंकड़े क्या कहते हैं: भाजपा के अभेद्य किले में सेंधमारी की चुनौती
2014 के बाद से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं का करीब 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा लगातार भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एनडीए के पक्ष में लामबंद रहा है:

2017 विधानसभा चुनाव: भाजपा ने 39.67% वोट शेयर के साथ 312 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

2022 विधानसभा चुनाव: भाजपा का वोट शेयर बढ़कर 41.29% हो गया, हालांकि सीटें घटकर 255 रह गईं।

सपा का प्रदर्शन: सपा का वोट शेयर 21.82% से बढ़कर 32.06% हुआ और सीटें 111 तक पहुंचीं, लेकिन यह बढ़त मुख्य रूप से बसपा के खिसके जनाधार से मिली। भाजपा का कोर वोट बैंक प्रभावित नहीं हुआ।

अखिलेश यादव यह भली-भांति समझ चुके हैं कि जब तक भाजपा के इस मजबूत पारंपरिक सामाजिक आधार में दरार नहीं डाली जाएगी, तब तक 203 से अधिक सीटों का जादुई बहुमत हासिल करना लगभग नामुमकिन रहेगा।

सपा को कहां दिख रही है गुंजाइश?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता के गलियारों में कुछ घटनाओं ने सपा को ब्राह्मण मतदाताओं के बीच जगह बनाने का अवसर दिया है:

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में ब्राह्मणों के एक वर्ग में यह धारणा बनाने की कोशिश की गई कि सत्ता में उनका पुराना प्रभाव कम हुआ है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की मौजूदगी के बावजूद अंदरूनी खींचतान की चर्चाएं सामने आती रही हैं।

ब्राह्मण विधायकों की अनौपचारिक बैठकों पर नोटिस, महाकुंभ में संतों से जुड़े विवाद और आरक्षण व यूसीसी की बहसों ने असंतोष की कुछ जमीन तैयार की है।

अखिलेश यादव इन्हीं अंतर्विरोधों को भुनाने के लिए ‘सनातन’ और ‘पंडित’ पहचान को पार्टी की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

चुनौतियां और अनसुलझे सवाल
हालांकि, अखिलेश यादव के इस नए रुख के सामने कई वैचारिक और राजनीतिक बाधाएं भी हैं:

नीतियों का टकराव: आरक्षण की सीमा 75 प्रतिशत करने की सपा की मांग और समान नागरिक संहिता (UCC) पर पार्टी का विरोध ब्राह्मण समाज की प्राथमिकताओं के विपरीत नजर आता है।

पारंपरिक वोट बैंक का दबाव: सपा का मूल आधार मुस्लिम-यादव गठजोड़ रहा है। ऐसे में दोनों वर्गों के हितों और अपेक्षाओं को एक साथ साधना आसान नहीं होगा।

सुरक्षा और सांस्कृतिक मुद्दे: ब्राह्मण मतदाता केवल प्रतीकात्मक राजनीति नहीं देखता, बल्कि कानून-व्यवस्था, सुरक्षा, विकास और सांस्कृतिक प्रतीकों के आधार पर निर्णय लेता है, जहां भाजपा की पकड़ लंबे समय से मजबूत रही है।

2027 के लिए बड़ा सियासी जोखिम
अखिलेश यादव का यह दांव साबित करता है कि 2027 की सियासी जंग पुराने ढर्रे पर नहीं लड़ी जा सकती। यदि ब्राह्मण मतदाताओं के एक छोटे हिस्से में भी बिखराव होता है, तो अवध और पूर्वांचल की दर्जनों सीटों का चुनावी नतीजा बदल सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश का प्रबुद्ध वर्ग अखिलेश के इस ‘पंडित वाले PDA’ पर कितना भरोसा जताता है।