कानून-व्यवस्था पर भरोसा, लेकिन नौकरियों पर सवाल: यूपी 2027 से पहले युवाओं की दो-टूक, क्या योगी के लिए आसान नहीं होगी राह?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले नौ वर्षों से योगी आदित्यनाथ का चेहरा प्रशासनिक मजबूती, बेहतर कानून-व्यवस्था और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की पहचान बना हुआ है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रचंड जीत के बाद राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा था कि 2027 का चुनावी सफर भी पार्टी के लिए बेहद आसान रहेगा। हालांकि, जमीनी स्तर पर युवाओं, छात्रों और नए मतदाताओं के बीच बन रहे समीकरण यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाला मुकाबला 2022 जैसा एकतरफा नहीं रहने वाला है।
सरकारी उपलब्धियों की स्वीकार्यता के बीच राज्य के विभिन्न हिस्सों—गोरखपुर, कानपुर, मेरठ, वाराणसी और लखनऊ—से सामने आ रही युवाओं की राय बताती है कि बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और महंगाई को लेकर गहरा असंतोष पनप रहा है।
गोरखपुर से मेरठ तक: रोजगार और पेपर लीक पर युवाओं की खरी-खरी
पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक युवाओं की बातचीत में कानून-व्यवस्था की तारीफ तो है, लेकिन करियर और भविष्य को लेकर चिंताएं हावी हैं।

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गोरखपुर: प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे आदित्य का कहना है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था सुधरी है, लेकिन रोजगार के अवसर सीमित हैं। उनका कहना है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक के मामलों ने छात्रों का भरोसा तोड़ा है। युवाओं की मांग है कि सरकार भर्ती प्रक्रियाओं में ठोस पारदर्शिता दिखाए, अन्यथा इसका सीधा असर मतदान पर पड़ेगा।
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कानपुर: प्रखर के अनुसार, एक्सप्रेसवे और सड़कों का निर्माण जरूर हुआ है, लेकिन आम परिवारों पर महंगाई का दबाव बढ़ गया है। 18 से 29 वर्ष की नई पीढ़ी (Gen-Z) को केवल डिजिटल अभियानों तक सीमित रखने के बजाय जमीनी स्तर पर रोजगार के नए अवसर चाहिए।
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मेरठ: ऋषभ का कहना है कि आरक्षण और भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता का मुद्दा अनसुलझा है। चाहे सामान्य वर्ग के युवा हों या पिछड़ा वर्ग, दोनों ही परीक्षा प्रक्रियाओं में देरी से परेशान हैं। उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री का चेहरा बेशक मजबूत है, लेकिन स्थानीय विधायकों और पार्टी प्रत्याशियों के खिलाफ नाराजगी (Anti-incumbency) जमीन पर दिख रही है।

धार्मिक नैरेटिव बनाम बुनियादी मुद्दे
वाराणसी और राजधानी लखनऊ के युवा राजनीतिक बहस के बदलते स्वरूप की ओर इशारा करते हैं।
वाराणसी के शिवाय का कहना है कि हिंदुत्व और सांस्कृतिक विकास के मुद्दों का प्रभाव अपनी जगह है, लेकिन 2027 का चुनाव मुख्य रूप से रोजगार, शिक्षा और जीवन-यापन की लागत पर लड़ा जाएगा। उनका मानना है कि यदि समाजवादी पार्टी (SP) युवाओं की इन चिंताओं को संगठित रूप देने में सफल रही, तो लड़ाई बेहद करीबी होगी।
वहीं लखनऊ के अनिकेत का आकलन है कि भाजपा की बूथ स्तर की मशीनरी अभी भी काफी मजबूत है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में जो सामाजिक और युवा असंतोष दिखा था, उसने पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में हलचल जरूर पैदा की है।
जातीय समीकरण और Gen-Z वोटरों का प्रभाव
चुनावी विश्लेषकों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी कुल वोटरों का एक बड़ा हिस्सा है। इस वर्ग में भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और सरकारी नौकरियों की कमी सबसे बड़ा चिंता का विषय बनी हुई है।
इसके साथ ही, सामाजिक ताने-बाने में भी बदलाव देखा जा रहा है। सामान्य वर्ग में आरक्षण को लेकर असहजता, ओबीसी वर्ग में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग और दलित मतों का विभाजन भाजपा के लिए रणनीतिक चुनौती खड़ी कर रहा है। दूसरी ओर, अखिलेश यादव का ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन और कांग्रेस के साथ जमीनी तालमेल इस असंतोष को भुनाने की कोशिश में लगा हुआ है।
योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत छवि और मजबूत प्रशासनिक पकड़ भाजपा को अब भी चुनावी बढ़त दिलाती है, लेकिन जमीनी स्तर से उठती युवाओं की आवाजें साफ कर रही हैं कि 2027 का चुनाव सिर्फ पुरानी उपलब्धियों के भरोसे नहीं जीता जा सकता। रोजगार और आजीविका से जुड़े सवालों का समाधान ही आगामी सत्ता की दिशा तय करेगा।
