आरक्षण में ‘कोटे के भीतर कोटा’ क्या है? जानिए इतिहास से अबतक पूरी कहानी
नई दिल्ली : भारतीय राजनीति और सामाजिक न्याय की बहस में ‘आरक्षण का उप-वर्गीकरण’ (Sub-categorization of Reservations) लंबे समय से एक बड़ा केंद्र बिंदु रहा है। साधारण शब्दों में कहें तो उप-वर्गीकरण का मतलब ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ देना है। इसका उद्देश्य पहले से ही आरक्षित श्रेणियों (जैसे SC, ST या OBC) के भीतर मौजूद उन उप-समूहों या जातियों को लाभ पहुँचाना है, जो विकास की दौड़ में अब भी सबसे पीछे छूटे हुए हैं।
आरक्षण उप-वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों?
इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य तर्क एक ही श्रेणी के भीतर की आर्थिक-सामाजिक असमानता को खत्म करना है। एक ही आरक्षित वर्ग के भीतर कुछ जातियाँ शिक्षा और नौकरियों में आगे निकल जाती हैं, जबकि कई उप-जातियाँ आज भी अत्यधिक पिछड़ी और हाशिए पर रहती हैं। उदाहरण के लिए, केंद्र स्तर पर गठित रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया था कि OBC आरक्षण के कुल लाभों का लगभग 97% हिस्सा केवल 25% जातियों को मिला, जबकि 983 समुदायों का प्रतिनिधित्व शून्य (0%) रहा। ऐसी ही असमानताओं को दूर करने के लिए कोटे के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग उठती रही है।
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भीतर उप-वर्गीकरण का इतिहास
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काका कालेलकर आयोग (1953): देश में सबसे पहले प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग ने वंचित वर्गों की पहचान के लिए उप-वर्गीकरण की सिफारिश की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया था।
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मंडल आयोग (1979): इसके सदस्य एल.आर. नाइक ने पिछड़ा वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग उठाई थी, लेकिन अंततः 1990 में जब वीपी सिंह सरकार ने सिफारिशें लागू कीं, तो एक ही सामान्य श्रेणी रखी गई।
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राज्यों के प्रयास: केंद्र से पहले कई राज्यों ने इसे अपनाया। बिहार में कर्पूरी ठाकुर सरकार ने 1978 में मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिश पर OBC को पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) में बांटा। वर्तमान में बिहार, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, हरियाणा समेत 11 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में OBC के भीतर उप-वर्गीकरण लागू है।
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रोहिणी आयोग (2017): नरेंद्र मोदी सरकार ने अनुच्छेद 340 के तहत न्यायमूर्ति जी. रोहिणी के नेतृत्व में समिति गठित की, जिसने जुलाई 2023 में राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
SC एवं ST के भीतर उप-वर्गीकरण और कानूनी लड़ाई
अनुसूचित जातियों और जनजातियों के भीतर उप-वर्गीकरण का सफर कानूनी मोर्चे पर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है:
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2004 का चिन्नैया मामला: सुप्रीम कोर्ट की 5-न्यायाधीशों की पीठ ने ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में राज्यों के उप-वर्गीकरण वाले कानून को खारिज कर दिया था। कोर्ट का तर्क था कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित SC सूचियाँ एक ‘समरूप समूह’ हैं और राज्य इसमें बदलाव नहीं कर सकते।
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1 अगस्त 2024 का ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट की 7-सदस्यीय पीठ ने अपने पुराने फैसले को बदलते हुए राज्यों को एससी और एसटी के भीतर उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक अधिकार दे दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा कोई भी वर्गीकरण मनमाना नहीं होना चाहिए, बल्कि पुख्ता और विश्वसनीय आंकड़ों पर आधारित होना चाहिए।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद से तेलंगाना, पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह व्यवस्था प्रभावी हो चुकी है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा जैसे राज्य भी पुख्ता आँकड़े जुटाकर इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
