8 बार विधायक, मंत्री और नेता प्रतिपक्ष… रामगोविंद चौधरी का निधन
Ram Govind Chaudhary Death: उत्तर प्रदेश की राजनीति ने अपना एक अनुभवी चेहरा खो दिया है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी का 25 सितंबर की रात लखनऊ स्थित पीजीआई अस्पताल में निधन हो गया। पिछले कुछ समय से उनकी सेहत लगातार गिर रही थी, जिसके चलते परिजनों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था, लेकिन हालत में सुधार नहीं हो पाया और शुक्रवार रात उन्होंने आखिरी सांस ली।
उनके जाने की खबर फैलते ही सियासी गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए लिखा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मंत्री रामगोविंद चौधरी जी का निधन अत्यंत दुखद है। उन्होंने प्रभु श्रीराम से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को सद्गति मिले और शोकाकुल परिवार को यह असहनीय दुख सहने की शक्ति मिले। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी इस खबर पर गहरा दुख जताया।
मुलायम से अखिलेश तक, हर दौर में बने रहे भरोसे के नेता
बलिया जिले की मिट्टी से निकले रामगोविंद चौधरी समाजवादी आंदोलन के उन स्तंभों में शामिल थे जिन्होंने अपनी पूरी सियासी जिंदगी इस विचारधारा को दे दी। वे यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे और बाद के वर्षों में अखिलेश यादव का भी उन पर वैसा ही भरोसा बना रहा। बांसडीह विधानसभा सीट से वे कुल आठ बार विधायक चुने गए, यह आंकड़ा खुद इस बात की गवाही देता है कि जनता के बीच उनकी पैठ कितनी गहरी थी। साल 2017 से 2022 तक उन्होंने यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाली। 2022 का विधानसभा चुनाव उनकी आखिरी राजनीतिक पारी साबित हुआ, जिसके बाद स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण वे सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर हो गए थे।
छात्रसंघ की राजनीति से शुरू हुई थी यह यात्रा
रामगोविंद चौधरी की सियासी जड़ें छात्र राजनीति में गहराई से जमी थीं। साल 1972 में वे टाउन कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री चुने गए, और महज दो साल बाद 1974 में इसी छात्रसंघ के अध्यक्ष बन गए। आपातकाल के दौर में उन्हें जेल की सजा भी काटनी पड़ी, करीब 24 महीने तक वे बलिया जेल में बंद रहे। जेल से बाहर आते ही उन्होंने बिना समय गंवाए सीधे मुख्यधारा की राजनीति में कदम रख दिया।
साल 1977 उनके राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा पड़ाव बना, जब उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद तो जैसे जीत का सिलसिला ही चल पड़ा, लगातार पांच बार उन्होंने अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व विधानसभा में किया। साल 1991 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में उन्हें पहली बार कैबिनेट मंत्री बनने का मौका मिला। समय के साथ उनकी भूमिका और विस्तृत होती गई, साल 2000 में वे समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने, और 2002 में इसी पार्टी के टिकट पर बांसडीह से एक बार फिर चुनाव जीता। साल 2004 में मुलायम सरकार में उन्हें फिर से मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली।
अखिलेश सरकार में भी संभाली अहम जिम्मेदारी
साल 2012 में बांसडीह से फिर विधायक बनने के बाद, अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें बेसिक शिक्षा तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। शिक्षा, शिक्षकों और ग्रामीण लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों पर उनकी खासी पकड़ मानी जाती थी, और उनके कार्यकाल के कई फैसले इन्हीं क्षेत्रों से जुड़े रहे। साल 2017 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद, जब समाजवादी पार्टी विपक्ष में आई, तो पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष की भूमिका सौंपी।
अस्पताल में अखिलेश से हुई थी आखिरी मुलाकात
बीमारी के दौरान जब वे लखनऊ के अस्पताल में भर्ती थे, तब अखिलेश यादव खुद उनसे मिलने पहुंचे थे। उस मुलाकात में रामगोविंद चौधरी ने जो बात कही, वह उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को साफ दर्शाती है, उन्होंने कहा था कि आगे चुनाव जीतना है और अखिलेश यादव को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाना है। यही जज्बा उनकी पूरी सियासी जिंदगी की पहचान रहा।
पिछले कुछ वर्षों से तबियत ठीक न रहने के कारण वे राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं थे, लेकिन उनका नाम समाजवादी आंदोलन के उन गिने-चुने नेताओं में हमेशा दर्ज रहेगा जिन्होंने छात्र राजनीति से लेकर सत्ता के गलियारों तक अपनी अलग पहचान बनाई। उनके निधन से समाजवादी पार्टी ने एक जमीन से जुड़ा, अनुभवी और संघर्षशील नेता खो दिया है।
