‘पिंजरे में बंद तोता कब बन जाता है पिटबुल?’: CBI-ED के बेकाबू होते अधिकारों पर बरसे पी. चिदंबरम
पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को और अधिक अधिकार देने के विचार को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि उचित देखरेख और निगरानी के अभाव में ‘पिंजरे में बंद तोता’ कभी-कभी खतरनाक ‘पिटबुल’ बन जाता है।
आईबी (IB) के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर यशोवर्धन आजाद की नई किताब ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक’ के विमोचन के अवसर पर आयोजित एक पैनल चर्चा के दौरान चिदंबरम ने यह तीखी टिप्पणी की।
अधिकारियों के दोहरे रवैये पर सवाल पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर बात करते हुए चिदंबरम ने कहा कि पुलिस व्यवस्था में स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) से लेकर डीजीपी (DGP) तक एक तय पदानुक्रम (Hierarchy) होती है। सीबीआई में बेहतरीन अधिकारी होते हैं, जिनमें से ज्यादातर राज्यों से प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर आते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जो अधिकारी राज्य में रहते हुए बहुत अच्छा काम करता है, वह केंद्र में आते ही ‘बुरा अधिकारी’ क्यों बन जाता है? हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वे राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर राजनीतिक दखल की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं करते, लेकिन अधिकारियों को भी अपने संगठन के अनुशासन का पालन करना चाहिए।
जांच एजेंसियों पर बाहरी निगरानी की जरूरत अगस्त 2019 में आईएनएक्स (INX) मीडिया मामले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए जा चुके चिदंबरम ने यशोवर्धन आजाद की इस राय का खुलकर विरोध किया कि ईडी और सीबीआई को और ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि इन दोनों एजेंसियों ने अपने कानूनी अधिकार क्षेत्र का बहुत ज्यादा उल्लंघन किया है और वे खुद ही कानून की तरह व्यवहार करने लगी हैं।
उन्होंने ब्यूरोक्रेट्स को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारी राजनेताओं के सामने खुलकर क्यों नहीं खड़े होते? उन्होंने कहा, “ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? तबादला हो जाएगा, लेकिन वे आपका सिर तो नहीं काट सकते।”
चिदंबरम ने सुझाव दिया कि सीबीआई और ईडी के कामकाज की पारदर्शी बाहरी निगरानी (External Oversight) होनी चाहिए। उन्होंने अमेरिका की एफबीआई (FBI) और अन्य संस्थाओं पर होने वाली विधायी निगरानी का उदाहरण देते हुए नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) एक्ट 2008 में किए गए संशोधनों का जिक्र किया, जिसके तहत एनआईए की चार्जशीट की समीक्षा के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का एक स्वतंत्र पैनल बनाया गया था।
