September 15, 2026

नेपाल में बाढ़ से 579 मौतें, तिब्बत में सिर्फ 5; चीन के आंकड़ों पर उठे सवाल

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नई दिल्ली :  नेपाल और तिब्बत की सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। लेकिन इस तबाही को लेकर दोनों तरफ से जो जानकारियां सामने आ रही हैं, उनमें जमीन-आसमान का अंतर है। काठमांडू से मिल रही लगातार रिपोर्टों के कारण नेपाल में हुई तबाही की खौफनाक तस्वीर स्पष्ट हो चुकी है, वहीं दूसरी तरफ तिब्बत जैसे संवेदनशील क्षेत्र से सूचनाओं पर चीन के कड़े नियंत्रण के कारण वास्तविक स्थिति को समझना बेहद मुश्किल हो गया है।

मौतों के आंकड़ों में चौंकाने वाला अंतर

द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार को नेपाल में बाढ़ से मरने वालों की आधिकारिक संख्या बढ़कर 579 हो गई है। इसके उलट, चीन ने अपने इलाके में मरने वालों का आंकड़ा मात्र पांच बताया है। यह अंतर इसलिए भी गंभीर सवाल खड़े करता है क्योंकि तिब्बत की ओर स्थित ग्यिरोंग सीमा चौकी के आसपास के गांवों में कई हजार लोग निवास करते हैं। इतनी व्यापक तबाही के बावजूद चीन द्वारा जारी कम मृतक आंकड़े संदेह पैदा कर रहे हैं।

नेपाल: पत्रकारों ने सामने रखी ग्राउंड जीरो की सच्चाई

नेपाल में प्रेस की स्वतंत्रता के चलते पत्रकारों ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों के जितना संभव हो सके करीब जाकर ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग की। उन्होंने बचे हुए लोगों और रेस्क्यू टीमों से बात की। स्थानीय लोगों के बयानों के आधार पर मीडिया ने घटनाक्रम की मिनट-दर-मिनट की जानकारी दुनिया के सामने रखी कि कैसे बाढ़ का पानी अचानक घरों में घुसा और लोगों को लील गया। हालांकि, इस प्राकृतिक आपदा का सटीक वैज्ञानिक कारण अभी तलाशा जा रहा है।

चीन: सिर्फ रेस्क्यू का गुणगान, तबाही पर पर्दा

द गार्जियन के मुताबिक, चीन के सरकारी मीडिया ने भी प्रभावित क्षेत्रों में अपने पत्रकार भेजे, लेकिन उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस राहत और बचाव कार्यों (Rescue Operations) को महिमामंडित करने पर था।

  • इन रिपोर्टों में तबाही के वास्तविक पैमाने को बड़ी चालाकी से छुपा लिया गया।

  • रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि तिब्बत के एक रिलीफ कैंप से लाइव कवरेज कर रहे चीनी पत्रकार ने अपने पीछे बैठे किसी भी पीड़ित से बात तक नहीं की।

तिब्बत में सूचनाओं पर क्यों है सख्त पहरा?

तिब्बत हमेशा से ही चीन के सबसे संवेदनशील और कड़े नियंत्रण वाले क्षेत्रों में से एक रहा है। यहां अधिक स्वायत्तता और धार्मिक स्वतंत्रता की मांग को लेकर तिब्बतियों द्वारा किए गए आत्मदाह और विरोध प्रदर्शनों को चीनी अधिकारियों ने हमेशा बलपूर्वक दबाया है।

  • तिब्बत में अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने की अनुमति नहीं है। वे केवल सरकारी नियंत्रण वाले ‘स्पॉन्सर्ड टूर्स’ के जरिए ही वहां जा सकते हैं।

  • कई तिब्बतियों के पास पासपोर्ट तक नहीं है और अगर वे विदेशी पत्रकारों से बात करते पाए जाते हैं, तो उन्हें कड़ी सजा दी जाती है।

लंदन स्थित SOAS यूनिवर्सिटी के चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग ने द गार्जियन को बताया कि बीजिंग तिब्बत से जुड़ी हर चीज को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के चश्मे से देखता है। त्सांग के मुताबिक, “यही वजह है कि तिब्बत से कोई भी ऐसी जानकारी या रिपोर्ट सामने आने की संभावना शून्य के बराबर है, जिसे शी जिनपिंग सरकार के शीर्ष स्तर से मंजूरी न मिली हो।”