September 15, 2026

नेपाल में तबाही: 180km/h की रफ्तार से आया ग्लेशियर सैलाब

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काठमांडू/नई दिल्ली: नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ और सैलाब की असल वजह हिमालय की ऊंची चोटियों पर घटी एक खतरनाक घटना है। समुद्र तल से 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर ग्लेशियर के टूटने से शुरू हुई इस प्राकृतिक आपदा ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया। 180 किलोमीटर प्रति घंटे की सुपरकार वाली रफ्तार से नीचे आए इस ‘आइस-रॉक एवलांच’ (बर्फ और चट्टानों का हिमस्खलन) ने चंद मिनटों में नेपाल के कई इलाकों को मलबे में तब्दील कर दिया।

कैसे शुरू हुई यह तबाही की चेन?

हिमालय की भौगोलिक संरचना ने इस सैलाब की रफ्तार को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाई:

  • ग्लेशियर का टूटना: समुद्र तल से 5,140 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा अचानक टूटा।

  • बुलडोजर इफेक्ट: तीखी ढलान पर यह बर्फ एक बुलडोजर की तरह नीचे आई और रास्ते में आने वाली हजारों चट्टानों और मिट्टी को उखाड़ते हुए अपने साथ मिला लिया।

  • नदियों में मिला मलबा: यह बर्फ, चट्टान और मलबे का मिश्रण लहेंदे खोला और भोटे कोशी जैसी पहाड़ी नदियों में गिरा, जहां इसे और पानी मिल गया, जिससे इसने एक विशाल सैलाब का रूप ले लिया।

7 मिनट में 20 किलोमीटर का सफर

इस सैलाब की रफ्तार इतनी तेज थी कि लोगों को संभलने का मौका ही नहीं मिला:

  • चीनी समयानुसार सुबह 10:52 बजे ग्लेशियर टूटा।

  • महज़ 7 मिनट बाद (10:59 बजे), यह मलबा 3,300 मीटर नीचे गिरकर 1,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गिरॉन्ग पोर्ट पहुंच गया।

  • इसकी औसत गति लगभग 50 मीटर प्रति सेकंड यानी 180 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है।

  • सैलाब का बहाव इतना शक्तिशाली था कि मलबा नदी की विपरीत दिशा में त्रिशूली नदी में 3 किलोमीटर तक ऊपर चढ़ गया।

तबाही का रास्ता: तिब्बत सीमा से भारत तक अलर्ट

लहेंदे खोला से शुरू होकर यह सैलाब भोटे कोशी नदी में मिला। इससे नेपाल के रसुवा जिले (टिमुरे और रसुवागढ़ी) में तबाही मची। आगे बढ़ते हुए यह त्रिशूली नदी के जरिए नुवाकोट जिले की बस्तियों में घुसा। इसके बाद जलप्रवाह नेपाल के नारायणी नदी तंत्र से होते हुए भारत की गंडक नदी की ओर बढ़ा, जिसके कारण भारत के मैदानी इलाकों में भी हाई अलर्ट जारी किया गया।

जलवायु परिवर्तन और 47 खतरनाक झीलें

ऊंचे पहाड़ी इलाकों में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ दिया है।

  • तापमान बढ़ने से ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट (सालों तक जमी रहने वाली जमीन) पिघल रहे हैं, जिससे पहाड़ी ढलानें कमजोर और अस्थिर हो रही हैं।

  • बर्फ पिघलने से बनी ग्लेशियल झीलें इस खतरे को और बढ़ा रही हैं।

  • ‘ईसीमोड’ (ICIMOD) की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में ऐसी 21 खतरनाक ग्लेशियल झीलें हैं, जिनके फटने से निचले इलाकों में अचानक बड़ी बाढ़ आ सकती है। इसके अलावा, तिब्बत में 25 और भारत में एक ‘ट्रांसबाउंड्री ग्लेशियल झील’ की पहचान की गई है, जो इस पूरे नदी तंत्र और आबादी के लिए स्थायी खतरा बनी हुई हैं।