आधी रात महिला की गिरफ्तारी पर क्या कहता है कानून? जानें 10 अधिकार
ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को सीजेपी (CJP) के तिरंगा मार्च से दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने उन्हें हिरासत में लिया और आधी रात तक थाने में रखा। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद देर रात उन्हें वकीलों के साथ घर भेज दिया गया।
इस कार्रवाई पर AISA ने सीधे सवाल उठाए हैं कि अंधेरा होने के बाद नेहा को थाने में क्यों रखा गया और पुलिस ने उनकी सुरक्षा की परवाह क्यों नहीं की। इस विवाद ने भारतीय कानून के तहत महिलाओं को मिले उन कानूनी अधिकारों की चर्चा तेज कर दी है, जिनका पालन करना हर पुलिस अधिकारी के लिए अनिवार्य है।
सूर्यास्त के बाद गिरफ्तारी पर क्या कहता है कानून?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 43(5), जो पहले CrPC की धारा 46(4) थी, के तहत सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले किसी भी महिला को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया जा सकता। न ही इस समय महिला को थाने आने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
अगर परिस्थितियां असाधारण हों, जघन्य अपराध हो या महिला के भागने की आशंका हो, तो पुलिस को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (JMFC) से लिखित अनुमति लेनी होगी। इसके बिना रात में की गई गिरफ्तारी गैर-कानूनी मानी जाती है। इसके अलावा, रात में महिला को थाने में लाने पर महिला पुलिस अधिकारी या कर्मचारी का वहां मौजूद होना अनिवार्य है।
पूछताछ, हथकड़ी और हिरासत की समयसीमा
कानून के अनुसार, पुलिस किसी भी महिला को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रख सकती। इन 24 घंटों में सफर का समय शामिल नहीं होता। हिरासत में लिए गए महिला और पुरुष को एक ही लॉकअप में नहीं रखा जा सकता।
BNSS की धारा 46(1) स्पष्ट करती है कि गिरफ्तार या डिटेन करते समय महिला को हथकड़ी नहीं पहनाई जाएगी। महिला को केवल महिला पुलिस अधिकारी ही हाथ लगा सकती है, कोई पुरुष अधिकारी नहीं। इसके साथ ही, धारा 160 के तहत महिलाओं को पूछताछ के लिए थाने में नहीं बुलाया जा सकता।
मुफ्त कानूनी मदद और गिरफ्तारी का कारण जानने का हक
संविधान का अनुच्छेद 39ए महिलाओं को निशुल्क कानूनी सहायता पाने का अधिकार देता है। राज्य विधि सेवा प्राधिकरण (BNSS) की धारा 304 के तहत अगर महिला कानूनी खर्च उठाने में सक्षम नहीं है, तो प्राधिकरण उसका खर्च उठाएगा। महिला अपने वकील के साथ थाने जाकर बयान दर्ज करा सकती है, जिससे बयानों के साथ छेड़छाड़ की गुंजाइश न रहे।
गिरफ्तारी की स्थिति में BNSS की धारा 50(1) के तहत महिला को अपनी गिरफ्तारी का कारण जानने का पूरा अधिकार है। वहीं, धारा 50(2) के अनुसार गैर-जमानती अपराध को छोड़कर अन्य मामलों में उसे जमानत पाने के आधार जानने से नहीं रोका जा सकता।
जीरो FIR, प्राइवेसी और मेडिकल जांच के नियम
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक, पीड़िता किसी भी थाने में जाकर ‘जीरो FIR’ दर्ज करा सकती है। अगर वह थाने जाने में सक्षम नहीं है, तो ईमेल या लेटर के जरिए उपायुक्त (DC) या वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत भेज सकती है। इसके बाद पुलिस घर आकर बयान दर्ज करने के लिए बाध्य है। समय बीत जाने का हवाला देकर पुलिस रेप या छेड़छाड़ की FIR लिखने से इनकार नहीं कर सकती।
रेप के मामलों में धारा 164 के तहत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज होते हैं। इस दौरान केवल पुलिस अधिकारी और महिला कांस्टेबल मौजूद रह सकते हैं। प्राइवेसी सुनिश्चित करने के लिए 5वें शख्स को वहां रहने की अनुमति नहीं होती। धारा 228ए के तहत पीड़िता की पहचान उजागर करना दंडनीय अपराध है। वहीं, धारा 164ए के तहत अगर कोई डॉक्टर यह कह दे कि रेप नहीं हुआ है, तब भी मामला खारिज नहीं होगा। पुलिस को पीड़िता का मेडिकल टेस्ट कराना ही होगा और उस रिपोर्ट को ही सबूत माना जाएगा।
