September 15, 2026

बसपा में परिवार का अंतिम अध्याय: भतीजों का अंत, भतीजी का इंतजार

mayawati

बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती का ताजा फैसला उत्तर प्रदेश की सियासत में किसी बड़े सरप्राइज से कम नहीं है। कांशीराम के जमाने से बसपा की राजनीति को समझने वालों के लिए यह एक लंबे राजनीतिक नाटक का तार्किक अंत नजर आता है। मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके भतीजों—आकाश आनंद और ईशान आनंद—को पार्टी में कोई राजनीतिक पद या लाभ नहीं मिलेगा। भविष्य में यदि उनके भाई आनंद कुमार को मदद की जरूरत पड़ी, तो वे केवल अपनी इकलौती बेटी दीपिका आनंद को साथ रख सकते हैं, जो फिलहाल कानून की पढ़ाई कर रही हैं।

कांशीराम की विरासत और मायावती की मजबूरी

यह फैसला सिर्फ पारिवारिक फेरबदल नहीं है, बल्कि उस प्रतिज्ञा का नया संस्करण है जो मायावती को कांशीराम से विरासत में मिली थी कि पार्टी किसी परिवार की जागीर नहीं बनेगी। मायावती ने खुद स्वीकार किया कि एक महिला और अविवाहित होने के नाते, अपनी देखभाल और सुरक्षा के लिए सबसे छोटे भाई आनंद कुमार को साथ रखना उनकी मजबूरी थी, कोई विकल्प नहीं।

आकाश का उदय, पतन और अब दीपिका पर नजर

बसपा में आकाश आनंद का सफर किसी रोलरकोस्टर से कम नहीं रहा। उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया, उत्तराधिकारी घोषित किया गया और खूब लाइमलाइट मिली। लेकिन अंतर्कलह, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और निष्कासन-वापसी के चक्र के बाद अंततः उन्हें किनारे कर दिया गया। छोटे भतीजे ईशान को भी आजमाया गया, लेकिन अब दोनों राजनीति से बाहर हैं।

मायावती का संदेश साफ है—बेटों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। अगर परिवार से किसी को राजनीति में आना ही है, तो वह बेटी दीपिका होंगी, वह भी पूरी तरह उनकी ईमानदारी, वफादारी और कार्यक्षमता को परखने के बाद। सार्वजनिक जीवन में अब तक अदृश्य रहीं दीपिका अब अचानक सियासत के केंद्र में हैं।

जेन-ज़ी (Gen-Z) कार्ड और बसपा का भविष्य

भतीजों को हटाने के साथ ही मायावती ने पार्टी में युवाओं (Gen-Z) को 50 प्रतिशत तक भागीदारी देने और टिकटों में प्राथमिकता देने का ऐलान किया है। इसके जरिए वे दो निशाने साध रही हैं: पहला, परिवारवाद के आरोपों से बचना और दूसरा, युवाओं को जोड़कर पार्टी में नई जान फूंकना। अगर कानून की छात्रा दीपिका आनंद भविष्य में आगे आती हैं, तो वे भी इसी युवा चेहरे का प्रतिनिधित्व करेंगी।

हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के लिए यह डगर आसान नहीं है। ऐसे समय में जब दलित वोट बैंक बिखर रहा है और संगठन कमजोर पड़ रहा है, मायावती का यह फैसला पार्टी को परिवारवाद के आरोपों से मुक्त कर पाएगा या फिर यह परिवारवाद का ही कोई नया रूप साबित होगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।