हिंदी परीक्षा पर महाराष्ट्र सरकार का यू-टर्न, 50 साल पुराना नियम खत्म
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में भाषा को लेकर एक बड़ा फैसला सामने आया है। राज्य सरकार ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आयोजित की जाने वाली हिंदी भाषा की परीक्षा को पूरी तरह से खत्म करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है। इस बड़े फैसले के साथ ही करीब 50 साल पुरानी उस व्यवस्था पर विराम लग गया है, जिसके तहत कुछ खास कर्मचारियों के लिए नौकरी के दौरान हिंदी परीक्षा पास करना अनिवार्य था।
सरकार के इस कदम के बाद अब सरकारी कर्मचारियों को वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) या पदोन्नति (प्रमोशन) के लिए हिंदी भाषा की परीक्षा पास करने की कोई बाध्यता नहीं होगी।
जून में हुई थी परीक्षा की घोषणा और बढ़ा था विवाद
यह पूरा मामला जून 2026 में तब गरमाया जब भाषा संचालनालय की ओर से सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित करने की घोषणा की गई थी, जिसकी तारीख 28 जून तय की गई थी। इस ऐलान के साथ ही राज्य में राजनीतिक दलों और मराठी भाषा प्रेमियों का विरोध शुरू हो गया।
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MNS की चेतावनी: राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने इसका सबसे आक्रामक विरोध किया। MNS नेता संदीप देशपांडे ने इसे ‘हिंदी थोपने की साजिश’ करार दिया और चेतावनी दी कि अगर परीक्षा हुई तो पार्टी कार्यकर्ता परीक्षा केंद्रों पर जोरदार प्रदर्शन करेंगे।
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उद्धव गुट का हमला: उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने भी सरकार को घेरते हुए सवाल उठाया कि जब मराठी को हाल ही में ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा मिला है, तो महाराष्ट्र के कर्मचारियों पर हिंदी परीक्षा की अनिवार्यता क्यों थोपी जा रही है? पार्टी ने यह भी पूछा कि क्या गुजरात या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में वहां के कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा अनिवार्य है?
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भाषाविदों का विरोध: मराठी अभ्यास केंद्र से जुड़े डॉ. दीपक पवार और अन्य शिक्षाविदों का कहना था कि सरकार को हिंदी पर समय और पैसा बर्बाद करने के बजाए अमराठी कर्मचारियों को मराठी सिखाने पर जोर देना चाहिए।
1976 और 1981 के पुराने आदेश हुए रद्द
लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव और विरोध के बीच सरकार ने 7 मई 2026 को ही परीक्षा पर रोक लगा दी थी, जिसे अब आधिकारिक रूप से स्थाई कर दिया गया है। नए आदेश के तहत 1976 और 1981 से चले आ रहे उन तमाम पुराने सरकारी प्रस्तावों को रद्द कर दिया गया है, जिनके आधार पर यह व्यवस्था चल रही थी।
नियम के मुताबिक, पहले जिन अधिकारियों या कर्मचारियों ने 10वीं कक्षा तक हिंदी की पढ़ाई नहीं की थी, उन्हें नौकरी के दौरान यह परीक्षा पास करनी होती थी। परीक्षा पास न होने की स्थिति में उनके वेतन वृद्धि या प्रमोशन पर रोक लग जाती थी। अब इस अनिवार्यता के खत्म होने से राज्य के लाखों कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। सरकार का तर्क है कि प्रशासनिक कामकाज की मुख्य भाषा मराठी है, जबकि अन्य राज्यों और केंद्र के साथ पत्राचार अंग्रेजी में होता है, ऐसे में इस पुरानी परीक्षा का अब कोई औचित्य नहीं बचा है।
