September 15, 2026

जानिए क्या सच में भारत रुकवा सकता है पश्चिम एशिया का युद्ध?

President Trump Welcomes Indian Prime Minister Modi To The White House

नई दिल्ली : किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मुलाकात देखने को मिली। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष को समाप्त कराने के लिए भारत के वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक संपर्कों का उपयोग करें। महीनों से जारी अमेरिका-इजराइल और ईरान के टकराव ने न केवल मध्य Middle East बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे संकटपूर्ण समय में ईरान का भारत से सहयोग मांगना अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की बढ़ती साख को रेखांकित करता है।

राष्ट्रपति पेज़ेशकियन और पीएम मोदी के बीच क्या हुई बातचीत?

  • युद्ध समाप्त करने की अपील: ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि संघर्ष को जारी रखना न तो ईरान, न ही इस क्षेत्र और न ही संपूर्ण मानवता के हित में है। उन्होंने भारत के ऐतिहासिक और संतुलित कूटनीतिक संबंधों का हवाला देते हुए पीएम मोदी से आग्रह किया कि वे संबंधित पक्षों को बातचीत और समझौते की मेज़ पर लाने में मदद करें।

  • एकतरफा कार्रवाई की आलोचना: पेज़ेशकियन ने कूटनीतिक तंत्र को नज़रअंदाज़ किए जाने पर अफ़सोस जताया और वाशिंगटन पर बातचीत के बजाय बल-प्रयोग का रास्ता चुनने का आरोप लगाया।

  • भारत का स्पष्ट रुख: प्रधानमंत्री मोदी ने दोहराया कि सभी क्षेत्रीय विवादों को केवल बातचीत और कूटनीति के ज़रिए ही सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए हरसंभव प्रयास करने की प्रतिबद्धता जताई।

  • समुद्री सुरक्षा और व्यापार: पीएम मोदी ने वाणिज्यिक जहाजरानी, नाविकों और नागरिक बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया, विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील जलमार्गों की सुरक्षा को रेखांकित किया।

  • आर्थिक और रणनीतिक सहयोग: दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने और चाबहार बंदरगाह जैसी महत्वपूर्ण संयुक्त परियोजनाओं को गति देने पर भी विस्तार से चर्चा की।

क्या भारत रुकवा सकता है यह युद्ध?

हालांकि यह कहना कठिन है कि भारत अकेले इस जटिल वैश्विक संघर्ष को पूरी तरह समाप्त करवा सकता है, लेकिन देश के पास कुछ ऐसी अद्वितीय रणनीतिक ताकतें हैं जो उसे एक निष्पक्ष और प्रभावी कूटनीतिक सेतु (Diplomatic Bridge) की भूमिका निभाने के योग्य बनाती हैं:

  • ‘मल्टी-अलाइंड’ (बहु-पक्षीय) संबंध: भारत के इज़राइल के साथ जहां मजबूत रणनीतिक रिश्ते हैं, वहीं ईरान के साथ गहरे ऊर्जा संबंध हैं। इसके साथ ही अमेरिका, सऊदी अरब और यूएई के साथ भी भारत के प्रगाढ़ संबंध हैं। किसी सैन्य गठबंधन से न बंधे होने के कारण वाशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान तीनों ही भारत की बात पर भरोसा कर सकते हैं।

  • भरोसेमंद बैक-चैनल डिप्लोमेसी: सार्वजनिक बयानबाज़ी से परे, भारत का निष्पक्ष रुख पर्दे के पीछे की गुप्त वार्ताओं के लिए एक सुरक्षित मंच प्रदान करता है, जिससे न्यूनतम शर्तों पर सहमति बनाई जा सकती है।

  • आर्थिक और ऊर्जा हित: भारत फारस की खाड़ी की स्थिरता पर निर्भर है। तनाव बढ़ने से होने वाले वैश्विक वित्तीय नुकसान को रेखांकित कर भारत क्षेत्रीय साझेदारों को युद्धविराम के लिए एकजुट कर सकता है।

  • ग्लोबल साउथ (Global South) का नेतृत्व: विकासशील देशों की सशक्त आवाज़ होने के नाते भारत ‘ग्लोबल साउथ’ को एकजुट कर युद्धरत पक्षों पर नैतिक और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव बना सकता है।

  • निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका: भारत मानवीय सहायता, समुद्री गलियारों की सुरक्षा और कैदियों की अदला-बदली जैसे विश्वास-वर्धक उपायों में एक तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।