“नया लखनऊ, पुरानी नफासत: क्या ‘पहले आप’ अब सिर्फ किस्सों में रह गया है?”
हैदरगंज की एक पुरानी चाय की दुकान पर सुबह दोपहर का रंग ले रही थी। तीन लोग बैठे थे—वासु, धर्मेंद्र और सुलेमान। एक-दूसरे को सालों से जानते हैं, लेकिन उनकी दुनिया अलग-अलग है।
वासु कानपुर से आए थे। दस साल हो गए लखनऊ में। धर्मेंद्र बाराबंकी से हैं। और सुलेमान? वे तो लखनऊ के ही हैं, पुराने लखनऊ के। चौक और अमीनाबाद की गलियों में पले-बढ़े।
बातचीत शुरू हुई तो सवाल वही था जो आज हर लखनऊ वाले के मन में घूमता है—क्या बदलते समय में लखनऊ भी बदल रहा है? और उसकी शरीफ जुबान बची है या नहीं?

शहर बदल रहा है, ये साफ है
गोमती नगर, इंदिरा नगर, जानकीपुरम… ऊंची इमारतें, कैफे, मॉल, फ्लाईओवर। जहां कभी शेर और गजल की महफिलें होती थीं, वहां अब कंसर्ट होते हैं। जहां तंदूरी कबाब और टुंडे के कबाब की खुशबू आती थी, वहां अब सुशी और टैको भी मिल जाते हैं। शहर ने नए मेहमानों का स्वागत किया है—अपनी पुरानी मेहमाननवाजी के साथ।
वासु कहते हैं, “कानपुर में तो सीधा बोलते हैं। यहां आकर पहले अजीब लगता था। ‘आप पहले’, ‘तशरीफ रखिए’, ‘नौश फरमाइए’… लगता था जैसे कोई फिल्म चल रही हो। लेकिन अब ये जुबान मुझे भी आ गई है। बच्चे स्कूल में ‘भाई’ और ‘यार’ बोलते हैं, लेकिन घर पर अभी भी ‘आप’ ही चलता है।”
धर्मेंद्र हंसते हुए जोड़ते हैं, “बाराबंकी में तो गाली भी प्यार से दी जाती है। यहां आकर देखा कि लोग गाली भी शरीफ अंदाज में देते हैं। ‘ढाई घड़ी का हैजा हो जाए’… सुनकर गुस्सा भी नहीं आता।”

शरीफ जुबान कहां गई?
सुलेमान चुप थे। फिर बोले, “जुबान तो है भाई, लेकिन कमजोर पड़ गई है। पुराने लखनऊ में एक लफ्ज में तीन माने छुपे होते थे। आजकल लोग जल्दी में हैं। मोबाइल पर ‘क्या हाल है’ लिखते हैं, ‘आप कैसे हैं’ भूल गए। उर्दू के शब्द कम हो रहे हैं। युवाओं की जुबान में अंग्रेजी और गालियां ज्यादा हैं।”
सच तो यही है। शहर का विस्तार हुआ है। बाहर से आने वाले लोग बढ़े हैं—कानपुर, बाराबंकी, पूर्वांचल, बिहार से। हर कोई अपनी बोली साथ लाया। नतीजा यह कि लखनऊ की पुरानी ‘लखनवी जुबान’ अब सिर्फ कुछ इलाकों और कुछ घरों तक सीमित रह गई है। चौक, अमीनाबाद, नक्खास में अभी भी ‘हुजूर’ और ‘जनाब’ सुनाई देते हैं। लेकिन नए इलाकों में ये शब्द विरले ही मिलते हैं।
तहजीब खत्म नहीं हुई, रूप बदल गई है
लखनऊ की तहजीब सिर्फ जुबान नहीं थी। यह एक रवैया था—दूसरे को पहले रखना, बात को नरम रखना, गुस्से को भी शायराना अंदाज में निकालना। आज भी कई जगह यह रवैया जिंदा है। रिक्शे वाले से लेकर दुकानदार तक, कई लोग अभी भी ‘आप’ कहकर बात करते हैं। शादी-ब्याह में, ईद पर, होली पर गंगा-जमुनी रंग अभी भी दिखता है।
लेकिन दबाव भी है। राजनीति, सोशल मीडिया, तेज जीवनशैली ने भाषा को कठोर बना दिया है। जहां पहले एक वाक्य में अदब होता था, अब वहां सीधा और तेज स्वर आ गया है।

तीनों की सहमति
वासु, धर्मेंद्र और सुलेमान अंत में एक बात पर सहमत हुए।
“शहर बदल रहा है। यह जरूरी भी है। लेकिन लखनऊ की असली पहचान उसकी शरीफ जुबान और तहजीब में है। अगर ये चली गई तो शहर सिर्फ एक और बड़ा शहर रह जाएगा। नवाबी शहर नहीं।”
सुलेमान ने आखिरी चुस्की ली और मुस्कुराते हुए कहा, “अभी भी वक्त है। जब तक घरों में बच्चे ‘आप’ बोलना सीखते हैं, जब तक गलियों में कोई ‘तशरीफ रखिए’ कहता है… लखनऊ जिंदा है।”
दस बज चूका था। तीनों उठे। वासु ने कहा, “चलो, चौक चलते हैं बक्सा वाले खस्ता खाने।” धर्मेंद्र बोले, “आप पहले।” सुलेमान मुस्कुराए, “नहीं हुजूर, आप ही तशरीफ ले चलिए, वैसे भी वहां पहुँच कर अभी इंतजार करना पड़ेगा।”
छोटी सी बातचीत में जवाब छुपा था। लखनऊ बदल रहा है। लेकिन उसकी शरीफ जुबान अभी पूरी तरह नहीं मरी है। वह सिर्फ थोड़ी और धीमी पड़ गई है।
