UNSC में भारत ने ठोका स्थायी सदस्यता का दावा: यूरोप के 4 देशों का मिला समर्थन
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संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता के लिए एक बार फिर मजबूती से अपनी दावेदारी पेश कर दी है। भारत के इस कदम से वैश्विक पटल पर उसकी एक उभरती हुई महाशक्ति की छवि और पुख्ता हुई है। एक तरफ जहां चीन हमेशा की तरह भारत की राह में रोड़े अटका रहा है, वहीं यूरोप के चार प्रमुख देशों— स्लोवाकिया, पोलैंड, हंगरी और चेक रिपब्लिक— ने भारत की दावेदारी का खुलकर समर्थन किया है।
वर्तमान में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन UNSC के पांच स्थायी सदस्य (Permanent Members) हैं, जबकि 15 अस्थायी सदस्य होते हैं। भारत ने अस्थायी सदस्यता के लिए भी दावा पेश किया है, जिस पर अगले साल 82वीं महासभा में फैसला होना है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्थायी सदस्यता मिलने से भारत की ताकत में कितना इजाफा होगा?
स्थायी सदस्यता से कैसे बढ़ेगी भारत की ताकत?
अगर भारत को UNSC की परमानेंट मेंबरशिप मिल जाती है, तो देश की कूटनीतिक और सामरिक ताकत में ऐतिहासिक वृद्धि होगी:
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मिलेगा ‘वीटो’ (Veto) का अधिकार: स्थायी सदस्य बनते ही भारत को वीटो पावर मिल जाएगी। इसका मतलब है कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी भी ऐसे प्रस्ताव को रोक सकेगा जो उसके राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हो।
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वैश्विक फैसलों में सीधी भागीदारी: अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, प्रतिबंधों और किसी भी सैन्य हस्तक्षेप जैसे अहम फैसलों में भारत अपना निर्णायक पक्ष रख सकेगा।
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आतंकवाद पर कड़ा प्रहार: राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी और भारत आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर वैश्विक स्तर पर और अधिक कड़े कदम उठा सकेगा। दुश्मनों और विरोधियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर घेरना आसान हो जाएगा।
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हमेशा के लिए पक्की सीट: अस्थायी सदस्यों को हर 2 साल में बाहर होना पड़ता है, लेकिन स्थायी सदस्यता मिलने पर यह डर खत्म हो जाएगा और भारत दुनिया की सबसे ताकतवर काउंसिल का हमेशा के लिए हिस्सा बन जाएगा।
50 साल में भारत को अब तक क्यों नहीं मिली मेंबरशिप?
1945 में UNSC की स्थापना के बाद से भारत आज तक स्थायी सदस्य नहीं बन पाया है, जिसके पीछे कई बड़ी कूटनीतिक और ढांचागत बाधाएं हैं:
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चीन का वीटो: रूस, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन भारत की दावेदारी का लगातार समर्थन करते हैं, लेकिन चीन हर बार वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत के प्रस्ताव को गिरा देता है। नियमों के अनुसार, नए स्थायी सदस्य के लिए पांचों वर्तमान स्थायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य है।
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चार्टर में बदलाव की जटिल प्रक्रिया: संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बदलाव करना बेहद मुश्किल है। इसके लिए 193 सदस्य देशों वाली महासभा (UNGA) के कम से कम दो-तिहाई (129 देशों) का समर्थन चाहिए, साथ ही पांचों स्थायी सदस्यों की मुहर भी लगनी चाहिए। 1945 से अब तक चार्टर में केवल एक बार बदलाव हुआ है, जब अस्थायी सदस्यों की संख्या 11 से बढ़ाकर 15 की गई थी।
‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ गुट का अड़ंगा
चीन के अलावा, एक पूरा गुट भी भारत की राह में खड़ा है जिसे ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (Uniting for Consensus) या ‘कॉफी क्लब’ कहा जाता है। पाकिस्तान, इटली, मैक्सिको, तुर्की और दक्षिण कोरिया इसके प्रमुख सदस्य हैं। इस गुट का मुख्य मकसद G4 देशों (भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील) को स्थायी सदस्य बनने से रोकना है। इन देशों की मांग है कि UNSC में स्थायी सदस्यों की बजाय सिर्फ अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए, क्योंकि ये देश भारत या अन्य दावेदारों को वीटो पावर मिलने के सख्त खिलाफ हैं।
