अमेरिका पीछे, पाकिस्तान-तुर्की की बैठक के बीच फ्रांस ने सऊदी को दिया बड़ा सहारा
नई दिल्ली: यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों से सऊदी अरब पर दबाव बढ़ रहा है। हूती सऊदी के शहरों के साथ उसके अहम तेल ठिकानों को भी निशाना बना रहे हैं। इस बीच फ्रांस ने सऊदी अरब की मदद के लिए बड़ा कदम उठाया है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि उनका देश यानबू की सुरक्षा मजबूत करने के लिए सैनिक, रडार और एयर डिफेंस सिस्टम भेजेगा। मैक्रों ने फ्रांसीसी टीवी चैनल TF1 और France 2 को दिए इंटरव्यू में यह जानकारी दी। उन्होंने साफ किया कि फ्रांस का उद्देश्य हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरना नहीं है। प्राथमिकता सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा करना है।
यानबू क्यों है इतना अहम?
लाल सागर के किनारे बसा यानबू सऊदी अरब के ऊर्जा नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां बड़े तेल भंडारण और रिफाइनिंग प्लांट मौजूद हैं। यानबू ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से भी जुड़ा है। इसके जरिए सऊदी अरब फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट को बाईपास कर लाल सागर के रास्ते तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा सकता है। इस पाइपलाइन की क्षमता करीब 70 लाख बैरल प्रतिदिन बताई जाती है। यही वजह है कि यानबू की सुरक्षा सऊदी अरब के लिए बेहद अहम मानी जाती है।
हूतियों ने यानबू को भी बनाया निशाना
रिपोर्ट के मुताबिक हूतियों ने गुरुवार को यानबू की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागने की कोशिश की। इससे पहले भी हूतियों ने यहां सऊदी तेल कंपनी अरामको के ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है। सऊदी सेना का कहना है कि उसने हूतियों की ओर से दागी गई कई बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट किया है।
अमेरिका और पाकिस्तान से सीधे सैन्य कदम का इंतजार
हूतियों के हमलों के बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की से भी सहयोग की उम्मीद जताई है। मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट के बाद तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को लेकर बातचीत हुई है। हालांकि, अब तक पाकिस्तान और तुर्की ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप का ऐलान नहीं किया है। सैन्य प्रमुखों की तत्काल बैठक कराने पर चर्चा जरूर हुई है। इसके बाद सऊदी अरब ने अमेरिका से मदद मांगी। रिपोर्टों के अनुसार, वॉशिंगटन फिलहाल हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने से दूरी बनाए हुए है। हालांकि दोनों देशों के बीच सुरक्षा और रणनीतिक संबंध जारी हैं। ब्रिटेन ने सऊदी लड़ाकू विमानों के लिए सीमित एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग सहायता देने का फैसला किया है।
फ्रांस की तैनाती क्यों महत्वपूर्ण?
इन घटनाक्रमों के बीच फ्रांस का फैसला अहम माना जा रहा है। मैक्रों के मुताबिक यानबू में भेजे जाने वाले सैनिकों का मुख्य काम सुरक्षा बढ़ाना और एयर डिफेंस को मजबूत करना होगा।
फ्रांस पहले ही हूतियों के हमलों की निंदा कर चुका है। 9 सितंबर को फ्रांसीसी विदेश मंत्रालय ने सऊदी अरब और यमन में नागरिक बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों पर चिंता जताई थी। मंत्रालय ने हूतियों से सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील भी की थी।
अगस्त में मैक्रों और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की मुलाकात भी हुई थी। इस दौरान दोनों देशों ने रक्षा सहयोग मजबूत करने की घोषणा की थी। ऐसे में यानबू में फ्रांसीसी तैनाती को दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।
