खरगे के ‘शुद्धिकरण’ पर कांग्रेस का बड़ा दांव, दलित सम्मान बना मुद्दा
नई दिल्ली : उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद कथित ‘शुद्धिकरण’ का मामला अब पूरी तरह से राष्ट्रीय राजनीति का रूप ले चुका है। मानसून सत्र खत्म होने के पंद्रह दिन बाद भी कांग्रेस इस विवाद को ठंडा नहीं होने दे रही है। पार्टी अध्यक्ष के साथ हुए इस कथित बर्ताव को कांग्रेस अब सीधे ‘दलित सम्मान और अधिकारों’ से जोड़कर उत्तर प्रदेश, पंजाब विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है।
संसद से लेकर CWC तक उठा मुद्दा
इस मामले की शुरुआत मानसून सत्र के आखिरी दिन हुई थी, जब मल्लिकार्जुन खरगे ने उत्तराखंड की बीजेपी सरकार पर तीखा हमला बोला। खरगे ने आरोप लगाया कि उनके दलित होने के कारण हल्द्वानी में उनकी रैली के बाद ‘शुद्धिकरण’ का कार्यक्रम कराया गया। शुरुआत में पार्टी की ओर से इस मुद्दे पर ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई गई, जिसके बाद सोनिया गांधी ने खरगे के साथ राज्यसभा के सभापति से मुलाकात कर मामले की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की हालिया बैठक में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में खरगे ने इस बात पर सख्त नाराजगी जताई कि उनकी ही पार्टी के कई नेताओं ने इस गंभीर मुद्दे को सही तरीके से नहीं उठाया। सीडब्ल्यूसी बैठक के करीब एक सप्ताह बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हल्द्वानी के कथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर बीजेपी पर सीधा निशाना साधा, जिसके बाद से पूरी पार्टी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है।
‘संविधान खतरे में’ के बाद नया राजनीतिक नैरेटिव
कांग्रेस की यह आक्रामकता सिर्फ मल्लिकार्जुन खरगे के बचाव तक सीमित नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘संविधान खतरे में है’ का नैरेटिव पार्टी के लिए काफी प्रभावी साबित हुआ था। इसी मुद्दे के जरिए कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने दलित वोट के एक बड़े हिस्से को अपने पक्ष में लामबंद किया, जिससे बीजेपी अपने दम पर लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर सकी।
अब कांग्रेस हल्द्वानी की घटना को इसी तर्ज पर बड़े नैरेटिव में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी की रणनीति ‘संविधान खतरे में है’ के बाद ‘दलित खतरे में हैं’ और ‘दलित सम्मान’ के मुद्दे को आगे बढ़ाकर अपने पक्ष में माहौल बनाने की है। मल्लिकार्जुन खरगे इस पूरे नैरेटिव का स्वाभाविक और तत्काल चेहरा बन गए हैं।
यूपी और पंजाब के दलित वोट बैंक पर नजर
कांग्रेस की नजर मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों पर है। देश की कुल आबादी में दलितों की हिस्सेदारी करीब 16 फीसदी है। उत्तर प्रदेश में यह आबादी करीब 20 फीसदी और पंजाब में 32 फीसदी के आसपास है। दोनों राज्यों के चुनावी नतीजों में दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि इस घटना को सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित न रखकर देशभर में दलितों के साथ होने वाले व्यवहार से जोड़ा जाए।
चुनौतियां और बीजेपी का जवाबी दांव
कांग्रेस के लिए इस नैरेटिव को चुनावी जीत में बदलना इतना आसान नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (BSP) लंबे समय से दलित राजनीति का प्रमुख केंद्र रही है और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी इस वोट बैंक में तेजी से सेंध लगा रही है।
दूसरी तरफ, बीजेपी दलित समुदाय को सिर्फ वोट बैंक के तौर पर देखे जाने के बजाय विकास और कल्याणकारी योजनाओं का कार्ड खेल रही है। पार्टी का जोर इस बात पर है कि केंद्र सरकार की अलग-अलग योजनाओं का सीधा लाभ दलित और गरीब परिवारों तक पहुंच रहा है।
पंजाब के 2022 विधानसभा चुनाव के नतीजे भी कांग्रेस के लिए एक बड़ा सबक हैं। पिछले चुनाव में पार्टी ने दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया था, इसके बावजूद कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हार गई थी। इससे स्पष्ट है कि सिर्फ किसी दलित नेता को आगे करने से चुनावी सफलता तय नहीं होती। स्थानीय मुद्दे, संगठन और अन्य समीकरण भी उतने ही जरूरी हैं।
हल्द्वानी का कथित ‘शुद्धिकरण’ विवाद आने वाले दिनों में देश की दलित राजनीति का एक अहम केंद्र बन सकता है, जिसकी पहली बड़ी परीक्षा यूपी और पंजाब के चुनावों में होगी।
