Gen Z को सलाह क्यों पसंद नहीं आती? जानें बिना मांगी एडवाइज से क्यों होती है परेशानी

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वैसे, हम सबने कभी न कभी, किसी न किसी को बिन मांगी सलाह दी है। जैसे—”बेटा, मेरी बात मानो तो ये करो”, “हमारे जमाने में ऐसा नहीं होता था”, “तुम अभी बच्चे हो, तुम क्या जानो”… ये डायलॉग अक्सर हर घर में सुनने को मिलते हैं। लेकिन अगर आपके घर में कोई जेन जी यानि 1997 से 2012 के बीच पैदा हुआ बच्चा है तो आपने भी नोटिस किया होगा कि यह सुनकर उनके चेहरे पर खुशी नहीं, बल्कि तनाव नजर आता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?

जब सलाह, सलाह न रहकर दखलअंदाजी बन जाए

देखिए, ज़रूरत के वक्त राय लेना और हर छोटी-बड़ी बात पर लेक्चर सुनना, इन दोनों चीजों में बड़ा अंतर है। जेन जी को सलाह से एलर्जी नहीं है। दिक्कत तब शुरू होती है जब सलाह बिन बुलाए मेहमान की तरह हर बातचीत में घुस आए। जब आप कुछ शेयर कर रहे हों और सामने वाला आपकी बात पूरी सुने बिना ही “तुम्हें ये करना चाहिए” बोल दे, तो भला किसे अच्छा लगेगा?

सलाह कौन दे रहा है-ये भी उतना ही ज़रूरी है

जेन जी के लिए सिर्फ सलाह मायने नहीं रखती, बल्कि “कौन” सलाह दे रहा है, ये ज्यादा मायने रखती है। इसे साइकोलॉजी की भाषा में ‘मैसेंजर इफेक्ट’ भी कहा जाता है। मतलब ये कि एक ही बात अगर माता-पिता कहें तो शायद कान के ऊपर से निकल जाए, लेकिन वही बात कोई दोस्त कहे, तो तुरंत दिल में उतर जाए।

अब यहां एक चीज और समझने वाली है, कि यदि आपका बच्चा वही बात किसी और से सुनकर मान रहा है जो आपने पहले कही थी तो इसे अपनी हार मत समझिए। असली जीत तो ये है कि बच्चे ने सही फैसला लिया, चाहे वो किसी की भी बात सुनकर लिया हो।

“मुझे सॉल्यूशन नहीं चाहिए, बस सुन लो”

ये शायद सबसे बड़ी बात है जो पुरानी पीढ़ी को समझनी चाहिए। हर बातचीत में तुरंत समाधान निकालना ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी कोई सिर्फ अपना मन हल्का करना चाहता है। बस इतना चाहता है कि कोई चुपचाप सुन ले, बिना जज किए, बिना सलाह चिपकाए। जब ऐसे वक्त में भी सामने से “तुम ये करो, वो करो” शुरू हो जाता है, तो सुनने वाले को लगता है कि उसकी भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं।

इंटरनेट का ज़माना है भाई, जानकारी की कमी नहीं

एक सच्चाई और है। जेन जी इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीच पली-बढ़ी पीढ़ी है। करियर हो, पढ़ाई हो, पैसों का मामला हो या रिश्तों की उलझन, हर चीज़ की जानकारी उनकी उंगलियों पर है। वो रिसर्च करती है, वीडियो देखती है, आर्टिकल पढ़ती है, एक्सपर्ट्स को फॉलो करती है।

ऐसे में जब कोई बार-बार बताए कि “तुम्हें ऐसा करना चाहिए”, तो उसे लगता है कि उसकी अक्ल पर सवाल उठाया जा रहा है। जैसे कोई कह रहा हो कि “तुम्हें कुछ नहीं पता, मैं बताता हूं।” ये भावना किसी को भी अच्छी नहीं लगती।

तो सलाह दें या ना दें?

सलाह ज़रूर दें। लेकिन पहले ये पूछ लें कि सामने वाला चाहता भी है या नहीं। इतना छोटा सा कदम पूरी बातचीत का रुख बदल सकता है।