दीपावली एवं छठ पर्व का भारतीय संस्कृति में महत्व

डा. जयशंकर
भारतीय संस्कृति त्योहारों की दृष्टि से अति संपन्न है। वर्ष का कोई ऐसा महीना नही मिलेगा जिसमे कोई न कोई त्योहार न पड़े। प्रत्येक महीना क्या हर पक्ष में त्योहार पड़ते हैं। भारतीय संस्कृति अपने सकारात्मक दृष्टिकोण,सदभाव, प्रसन्नता और शान्ति की खोज के लिए संपूर्ण विश्व की संस्कृतियों में सर्वश्रेष्ठ तथा सुविख्यात है। वेद-वेदांग, पुराण, साहित्य अपनी इसी भावधारा और उनमें संगुंफित इन्हीं तत्वों के लिए जाने जाते हैं। अति प्राच्यकाल से इन ग्रंथों के सर्जक ऋषि-महर्षियों ने न केवल इस प्राकृतिक सौन्दर्य से सजी हुई, नदियों के उद्दाम प्रवाह, मोक्षदायिनी, निरोगी काया प्रदान करने प्रदान करने वाली संपूर्ण पापों की विनाशिनी गंगा-यमुना गुप्त सरस्वती के कलरव-निनाद से रंजित, लोक-परलोक दोनों को सुधारने वाली निर्मल, पापमुक्त करने वाली पूजनीय वबहुविध नाम संज्ञा से अभिहित नदियाँ है। संपूर्ण विश्व के आकर्षण का केन्द्र गंगा, यमुना एवं सरस्वती का संगम जहां प्रति वर्ष करोड़ों-करोड़ लोग स्नान,ध्यान, आचमन-स्पर्श कर अपने जीवन को धन्य मानते हैं। जो प्राचीन काल से लेकर आज तक संपूर्ण विश्व के लिए अपनी महिमा, धन्यता तथा एक स्थान पर कई एक देशों की जनसंख्या के बराबर लोगों के हुजूम का शान्त-पवित्र भाव से भाईचारा के साथ भयंकर हाड़ को कंपाने वाली ठंड के बावजूद अल्प साधनों के साथ पूरे एक महीनें योग प्राणायाम, ध्यान-तप, नाम-सुमिरन करने वाले तीसरे-चौथे पन मे पहुंच चुके कल्पवासी लोगों के उत्साह-स्फूर्ति को आश्चर्य भरी दृष्टि से देखकर देशी-विदेशी पर्यटक दांतो तले अंगुली काटने के लिए अनायास मजबूर हो उठते हैं। पूरे महीने भर अमीर गरीब, साधु-संयासी, नागा-वैरागी-अवधूत, पीठाधिश्वरों की सतत सुव्यवस्थित उपस्थिति, संगम में डुबकी, आचमनी, प्रक्षालन करने के लिए उनकी लालायित उत्कंठा को देखकर अनादि काल से लेकर आज तक संपूर्ण विश्व के लिए आकर्षण एवं आश्चर्य का केन्द्र बना हुआ है। इस अदभुत धरा के निवासियों, यहां विद्यमान चर-अचर, जड़-जंगम, चेतन-अचेतन तत्वों के स्वस्थ-संपन्न, प्रसन्न, कल्याणमय-भाव, शान्त भाव से वास करने और आने-जाने वालों के रेला को देखकर विस्फारित हो उठते हैं।
यहां के प्रत्येक कार्य में सकारात्मक दृष्टिकोण रखने, आशा से लबालब लोग प्रत्येक कार्य को संपन्न करने के लिए तथा संपादित करते समय सदैव प्रसन्नता, पवित्रता, लगन व तन्मयता रखने के लिए हजारों वर्ष पूर्व मे ही यहां के समाज वैज्ञानिक, ऋषि-महर्षियों ने प्रत्येक कार्य को धरम-करम, उत्सव, पवित्र अवसर, देवी-देवताओं अथवा किसी न किसी त्योहार-पर्व से जोड़ दिया है। भारत देश पूर्व की भांति आज भी कृषि प्रधान देश है। यहां की जीडीपी में कृषि-कार्य की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। इसीलिए यहां के अधिकांश त्योहार और पर्व कृषि कार्य की शुरूआत मध्य और पैदावार होने के विभिन्न अवसर से जुड़े हैं। जुताई, बोवाई, फसलों की निराई-गुड़ाई और उनकी कटाई, अन्न निष्पादन की प्रक्रिया से जुड़े है। कुछ त्योहार ऐसे हैं जो ऋतु परिवर्तन पर अर्थात ऋतु संक्रमण के समय जाने वाली और आने वाली ऋतु के अनुसार मनुष्य को अपने जीवनशैली आहार-व्यवहार, भेष-भूषा में बदलाव करने, हेतु प्रत्येक मनुष्य को जागरूक करने के लिए मनाए जाते हैं। भारत के महत्वपूर्ण त्योहारों में नवान्ह्न, मकर संक्रांति, होली, शादी-विवाह, विभिन्न नहान, विभिन्न मेले, नवरात्र, दशहरा, दिपावली, गोवर्धन पूजा, भाईदूज, छठ पूजा, नागपंचमी, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, गणेशोत्सव, जीवितपुत्रिका, ढेलही गणेश चौथ, गणेश चौथ, कजरी-तीज, ओणम आदि हैं।
दीपावली: प्रकाश और समृद्धि का पर्व
उन्हीं त्योहारों में से महत्वपूर्ण त्योहार दीपावली है, जिसको त्योहारों की श्रृंखला भी कहते हैं। इसको प्रकाश पर्व, प्रकाशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। यह उत्तरी गोलार्ध की शरद ऋतु मे कार्तिक मास की अमावस्या को प्रति वर्ष मनाई जाती है। यह त्योहार ग्रेगोरी कलेंडर के अनुसार पंचदिवसीय त्योहार है। प्रथम दिन को यम दीपक, धनतेरस, क्वाह पूजा या काग विहार के रूप मे, द्वितिय दिवस को नरक चतुर्दशी, काली चौदस, हनुमान पूजा छोटी दीपावली, खीचा पूजा अथवा कुकुर तिहार के रूप में, तीसरे दिवस को लक्ष्मी पूजा या काली पूजा या केदार गौरी व्रत या अथवा गाई तिहार के रूप में, चौथे दिन को गोवर्धन पूजा या बलि प्रतिपदा या म्हा पूजा या गोरू पूजा, पांचवें दिवस को भाई दूज या विश्वकर्मा पूजा या गुजराती नववर्ष के रूप मे मनाया जाता है। यह सदियों से मनाया जाने वाला त्योहार है। सैन्धव सभ्यता में मिट्टी के दियों के मिलने से भी पता चलता है कि यह भारत के प्राचीनतम त्योहारों में से एक है। यह त्योहार भी मूल रूप से खेती-किसानी अर्थात् कृषि कर्म से ही जुड़ा है।
इसको प्रकाश, सत्य, सुख-समृद्धि तथा आशा-उत्साह का पर्व भी माना जाता है। इसमे व्रत, हवन,, यज्ञ, दान भी किया जाता है तथा प्रदर्शनियां, उपहारों, मिठाइयों के आदान-प्रदान के साथ-साथ घरों में तरह-तरह के पकवान भी बनाए जाते हैं। यह आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश का, असत्य पर सत्य का, अन्याय पर न्याय का, अत्याचार पर सदाचार के, नकारात्मक, विध्वंसक शक्तियों पर जनकल्याणकारी सकारात्मक ऊर्जा-शक्ति का, अधर्म पर धर्म के विजय का भी द्योतक है। दीपावली एक सामासिक शब्द है जो दीप और अवली दो शब्दों के मेल से बना है। संस्कृत भाषा मे इसे दीपावलि कहा जाता है। इसका अर्थ है दीपों की पंक्ति, दीपों की लड़ी। यह संपूर्ण भारत में अरूणाचल से कच्छ तक काश्मीर, से अटक-कटक कन्याकुमारी तक विभिन्न तौर-तरीकों से कहीं धूम-धाम से तो कहीं शान्तिप्रिय ढंग से चिंतन-मनन उपासना करके, कहीं बृहद आतिशबाजी के साथ मनाई जाती है।
इस दिन से पूर्व घरों-दरवाजों, आसपास की सफाई, रंग-रोगन भी किया जाता है और प्रवेश द्वारों को फूल-तोरण, घी के दियों, चटक, आंखों को सुख देने वाले रंगों से निर्मित रंगोली से सजाया जाता है। बिजली की झालरों इत्यादि सजावटी संसाधनों से सभी लोग मकान-दरवाजों, व्यवसायिक केन्द्रों, सरकारी-गैरसरकारी इमारतों को जगमगाते है। केवल भारत मे ही नही अपितु विश्व के जिन-जिन देशों में भारतीय मूल के लोग बसे हैं या कार्य कर रहे हैं चाहे जर्मनी हो या जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका हो या आस्ट्रेलिया, यूनाइटेड ब्रिटेन हो या कनाडा आदि अनेकानेक सभी देशों मे यह त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। फीजी, सूरीनाम, मारिसश, गुयाना, पडोसी देश नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश की तो बात ही क्या करनी है। जो भी देश भारतीय संस्कृति से नाभिनाल संबद्ध हैं उनमें तो मनाया जाना स्वाभाविक है। यही नही इस त्योहार की जगतप्रसिद्धि और इसके मानव जीवन मे महत्व, जनकल्याण, प्रतीकात्मक सार्थकता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को ‘नो-मिटिंग डे’ घोषित किया है। साथ ही यूनेस्कों ने इस त्योहार को वैश्विक अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया है।
दीपावली से जुड़ी धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं
इस त्योहार को मनाए जाने के संबंध मे विभिन्न पुराणों, धार्मिक ग्रंथों, प्राच्य साहित्य में भिन्न-भिन्न मान्यताएं हैं।
संपूर्ण देश में प्रांतर-प्रातंर 14 वर्ष भ्रमण करते हुए संपूर्ण राक्षस कुल का विनाश कर 14 वर्ष की वनवास की अवधि को व्यतीत कर जब राजा राम सीता-लक्ष्मण की अयोध्या वापसी हुई तब उसी खुशी में अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय प्राणसम राजा और संपूर्ण प्रजा से परिवार के सदस्यों की भांति व्यवहार करने वाली, हमेशा सबकी हितचिन्ता में अहर्निश रहने वाली जनक नंदिनी, ऊपर से कठोर लेकिन अंतस से दयालु, अग्रज को पिता और सीता को माँ समान मानने वाले अद्भुत वीर लक्ष्मण के आगमन की खुशी में घर-गलियों, चौक-चौराहों, बाग-बगीचों को घी के पवित्र दीए और फूल-पत्तियों, तोरण आदि से सजाकर प्रसन्नता प्रकट की थी। वही परंपरा आज भी कायम है जिसको दीपावली नाम से भारतवासी मनाते हैं।
दक्षिण भारत में एक पौराणिक कथा के अनुसार दीपावली भगवान कृष्ण द्वारा विकट और भयंकर शक्तिशाली राक्षस नरकासुर के वध की खुशी में मनाई जाती है, जिसने अपने कारागृह मे अनेक कन्याओं को बन्दी बना रक्खा था। तीसरी कथा के अनुसार इसी दिन समुद्र मंथन तथा उससे धन, वैभव और समृद्धि की महादेवी लक्ष्मी और भगवान धनवंतरी के प्रकट होने के कारण माँ लक्ष्मी और बुद्धि-विद्या के देवता गणेश जी की पूजा की जाती है। तीसरी कथा के अनुसार पश्चिमी भारत में भगवान विष्णु के द्वारा वामन अवतार लेकर बलि की पूरी जमीन को तीन कदमों में नापकर दानस्वरूप छीनकर उसे पाताल लोक भेज दिया। हिन्दू समुदाय के अलावा बौद्ध-जैन, सिख समुदाय में भी विभिन्न कारणों से मनाया जाता है। इस दिन को बौद्ध समुदाय में जहां सम्राट अशोक के द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने की घटना से जोड़कर देखा जाता है वहीं जैन समुदाय इस दिन को जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी के मोक्ष (निर्वाण) दिवस के रूप मे मनाता है। सिख समुदाय इस दिवस को बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है। ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार इसी दिन गुरु हरगोविंद सिंह जी को मुगलों ने कैद से मुक्त किया था। मैथिली संस्कृति मे इसे हुक्का-पाती भी कहते हैं।
देश के अलग-अलग राज्यों में दीपावली
भारत के विभिन्न राज्यों मे दीपावली तरह-तरह से मनाई जाती है। उत्तर भारत में यह त्योहार पांच दिनों तक धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भईया दूज के रूप में मनाया जाता है। इन दिवसों में घरों को रंगोली, तोरण आदि से सजाकर दीपों से सजाकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन और दरवाजे पर गोबर से गोवर्धन बनाकर लईया, चिउरा, कुटकी, गट्टा, मिष्ठान आदि चढाकर कहानियां कहते हुए गीत गवनई के साथ मनाया जाता है। गोधन कूटते समय गाई जाने वाली गीतों में कुछ मशहूर गीत इस प्रकार हैं।
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गोधन बाबा चलले अहेरिया।
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गोधन कूटे चलली सभे बहिनी बाबा के दुआर।
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उठऊ ए देव उठऊ।
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छोटी मुटी गोधन भईया।
पूर्व के बिहार प्रदेश और झारखण्ड प्रदेश में दीपावली पर्व पर दीप प्रज्जवलन, पूजा के साथ पारंपरिक गीत-नृत्यों को विशेष महत्व दिया जाता है। पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर प्रदेशों आसाम, मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल, सिक्किम, मिजोरम में शाक्त मत की विशेष मान्यता होने के कारण इसे काली पूजा के रूप मे मनाया जाता है जिसमें उद्भवकारिणी, जगतकारिणी, संहारकारिणी माँ काली की विधि-विधान के साथ नवीन अथवा स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पुष्प-माला, धूपदीप-नैवेद्य, मिष्ठान, दाल-चावल और मछली को समर्पित करते हुए साधना-अराधना, पूजन-अर्चन के साथ विशेष गायन-वादन के साथ मनाया जाता है।
ओडिशा में दीपावली के अवसर को लोग कौरिया काठी करते हैं। इस पर्व को पूर्वजों की पूजा-अर्चना-स्मरण के रूप में भी मनाया जाता है। पूर्वजों से आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु जूट की छड़ों को जलाते हैं। यहां के लोग इस पर्व पर लक्ष्मी-गणेश तथा देवी काली की पूजा भी करते हैं। दक्षिण भारत के लोग पहले दिन को वसुर बरस के रूपमें मनाते हैं। इसे मुख्य रूप से नरक चतुर्दशी के रूप मे एक दिन पूर्व या प्रातः जल्दी उठकर तेल स्नान और नरकासुर नामक राक्षस के कृष्ण के द्वारा वध किए जाने की खुशी मे मनाया जाता है। तैल स्नान को जहां शुभ माना जाता है, वहीं पर मान्यता है कि नरकासुर के वध से शरीर पर पडे़ रक्त के छिटों को साफ करने के लिए तैल-स्नान किया जाता है।
दक्षिण के राज्यों में दीपावली वाले दिन को ‘थलाई दिवाली’ भी कहा जाता है। थलाई दीवाली की परंपरा के अनुसार इस दिन नवविवाहित जोड़े लड़की के घर जाते हैं जहां पर इनका भव्य स्वागत किया जाता है और उस घर के बडे़-बुजुर्ग इस जोडे को आशीर्वाद के साथ-साथ उपहार भी देतें हैं। इसके पश्चात् यह जोड़ा दिवाली के शगुन स्वरूप एक पटाखा जलाता है और घर परिवार के सभी लोग साथ मे भगवान के दर्शन, आशीर्वाद के लिए मंदिर जाते हैं।
इस परंपरा के अलावा आंध्र प्रदेश में हरिकथा का संगीतमय वर्णन किया जाता है तथा सत्यभामा की मिट्टी निर्मित मूर्तियों की पूजा की जाती है। कर्नाटक प्रदेश में प्रथम दिवस अश्विजा कृष्ण चतुर्दशी, दूसरा दिवस पद्यमी बाली के नाम से प्रचलित है। इस दिन राजा बलि से संबंधित कहानियों का उत्सव मनाया जाता है और महिलाएं घर-दरवाजे को गोबर से लीप-पोतकर तरह-तरह की रंगोली-दीपों से सजाया जाता है। गुजरात-महाराष्ट्र में दीपावली के अगले दिन को नववर्ष के रूप मे मनाती है। पुराने बही-खाते को पूजन के साथ बदलकर नए बही-खाते का आगामी वर्ष में अत्याधिक व्यापार, लाभ होने की कामना के साथ पूजन अर्चन कर शुभारंभ किया जाता है।
गोवा राज्य मे इस दिन को भगवान कृष्ण के द्वारा नरकासुर के वध के प्रतीक के रूप में नरकासुर के रंग बिरंगे पुतलों को बहुत खुशी प्रसन्नता के जश्न मे दहन किया जाता है। उत्तर भारत की तरह पश्चिम भारत में दीपावली त्योहार पांच दिनों तक, मध्य भारत अर्थात मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी पंचदिवसीय परंपरा ही प्रचलित है। मध्य भारत में रंगोली के बजाए मांडना बनाने की परंपरा है। यहां दीयों और मोर के पंख से घर को सुसज्जित किया जाता है। वहीं दक्षिण भारत में दीपावली दो दिन तक मनाई जाती है।
लेकिन एक तथ्य बहुत ही आश्चर्य जनक है कि जब पूरा देश धूमधाम से दीपावली के जश्न में अंगडाईयां ले रहा होता है तब छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में इसकी जिक्र तक नही होती है। क्योंकि यहां की परंपरा मे यह है ही नही, यहां का आदिवासी समुदाय अपनी आदिम परंपराओं को मनाता हैं। बौदध, जैन धर्म, सिख समुदाय की भांति ही आर्य समाज के लोग आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद के निर्वाण दिवस के रूप में हंसी-खुशी, सोत्साह से मनाते हैं।
छठ पूजा: सूर्य और प्रकृति की उपासना
छठ पूजा सूर्य और छठी मईया,जिन्हें षष्ठी देवी भी कहते हैं, को समर्पित प्रकृति से संगुफित सनातनी त्योहार है। इसको प्रकृति, सूर्य की अनंत ऊर्जा के प्रति आभार और संतान के दीर्घायु होने की कामना के लिए मनाया जाता है। इस त्योहार को सूर्य उपासना के नाम से भी जाना जाना जाता है।
भारतीय संस्कृति का यह ऐसा मौलिक और अद्भुत त्योहार है जिसमें उदयगामी सूर्य के साथ-साथ अस्ताचलगामी सूर्य की पवित्रता-तन्मयता-शुचिता एवं पूर्ण समर्पण भाव से दृढ़ता और कठोर व्रत-उपवास के साथ निर्जला रहकर अखंड घृत के ज्योतिर्मय, आंवे में खूब पके हुए चटक सेंदूरिया रंग के पवित्र मिट्टी के टटके दीपदान के संग पूजा की जाती है। सूर्यदेव को इस पृथ्वी के विभिन्न ललहाती फसलों, जीवजन्तुओं के जीवन का आधार माना जाता है। सूर्य की अनंत, अपरिमेय ऊर्जा से ही प्रकृति में फसलें और जीवन गतिशील रहता है। जीवों के साथ-साथ फसलों के स्वास्थ्य के लिए सूर्य-ऊर्जा अति आवश्यक है। सूर्य की ऊर्जा के अभाव में जीवन-जगत की कल्पना असंभव है। सूर्यदेव वैश्विक कल्याण की कामना से समभाव से दरियादिली के साथ सबका पालन-पोषण, सतत ऋषि-भाव से करते रहते हैं। इसके लिए उनकी कोई मांग नही होती। सूर्यदेव के इसी अहर्निश किए जा रहे अव्यक्त परोपकार के प्रति आभार स्वरूप उनकी दोनों स्थितियों में पूजा अर्चना की जाती है।
दूसरा षष्ठी माता को संतान दायिनी, पालन-पोषण कर्त्री, रक्षिका, आयुवर्धिनी, धन-धान्य, सुख-संपन्नतादायिनी कहा जाता है। इसीलिए माताएं, संतान की इच्छा रखने वाली, कोख के भर जाने की चाह में स्त्री-पुरूष, सदैव स्वस्थ, तंदुरुस्त रहने, रोजी-रोजगार की कामना पूर्ति के लिए बालबृद्ध-युवा सभी षष्ठी माँ और सूर्यदेव की पूजा शास्त्रोक्त विधि के अनुसार पूजा करते हैं। इसमें किसी मूर्ति की पूजा नही की जाती, यह एक प्रकार से प्रतिकात्मक निर्गुण पूजा-अर्चना है। इसमें सीधे प्रकृति से जुड़कर नदी, तालाब, सूर्य की उपासना उन्हीं को साक्षी मानकर की जाती है। नदी, तालाब की उपलब्धता न होने पर पानी का आर्टिफीसियल स्रोत बनाकर भी विधिविधान के साथ शास्त्रोक्त ढंग से पूजा की जाती है।
इसमें प्रकृति प्रदत्त फल-फूल जटाजूटमय नारियल या साबूत नारियल, सिंघाडे, अदरक, हल्दी के पौधे, चकोतरा, ईमली, सुथनी-शकरकंदी, पत्तेदार साबूत गन्ने, नववस्त्र, सांबा, कोदों तालाबिय काले रंग के विशेष चावल, हस्तनिर्मित ठोकवा, रोट, पूडी, गुलगुला, निखालिस भिगोए हुए चने के साथ की जाती है। इसमें चावल के हल्दी मिश्रित आटे के ऐपन, लालरंग की रुई के वृताकार थापे का भी विशेष महत्व है। यह तीन दिन के उपवास का व्रत है। नहाय-खाए, खरना के बाद तीसरे दिन निर्जला व्रत रहकर उसी दिन सायंकाल में अस्ताचलगामी सूर्य को पानी में खड़ा होकर जल से अर्ध्य दिया जाता है। अगले दिन प्रातः काल में उदयगामी सूर्य को गाय के कच्चे दुग्ध से अर्ध्य देकर षष्ठी माँ का भजन कीर्तन कर व्रत की संपन्नता की जाती है। उसके पश्चात् व्रती स्त्रियां घी में गुड़ को खौलाकर उसी से व्रत तोड़ती हैं तथा भीगे चढ़ाए हुए चने के कुछ दानों का भोग भी लगाती हैं। यह चतुर्दिवसीय पर्व है।
छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथाएं
छठ पूजा भारतीय जीवन का अतिप्राचीन पर्व है। इसका मूल प्राचीन वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। वेद के महत्वपूर्ण अंग ऋग्वेद में सूर्यदेव की स्तुति संबंधी कई मंत्र मिलते हैं। महाभारत की कथा के अनुसार जब पांडव द्युत क्रीड़ा में कौरवों से अपना सभी राजपाट द्रौपदी सहित हार गए थे, तब द्रौपदी ने पांडवों के कल्याण के लिए सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा अर्चना की थी।
महाभारत के संबोधित सुतपुत्र महावीर, महादानी कर्ण सूर्य पुत्र थे। वे प्रतिदिन पानी में स्तंभवत खडे़ होकर घंटो-घंटो तक सूर्यदेव को जलार्ध्य दिया करते थे। जनश्रुति कहती है कि इसीलिए व्रती पानी में सूर्याभिमुख खडे होकर सूर्य भगवान को जलार्ध्य देंते हैं। रामायण संबंधी कथा के अनुसार लंका विजय के पश्चात प्रभु श्रीराम और जगदजननी सीता जी ने कार्तिक शुक्ल षष्ठमी के दिन बिहार प्रदेश के मुंगेर में गंगा तट पर ऋषि मुद्गल के निर्देशन में सूर्यदेव की वंदना-अर्चना पूजा की थी। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सृष्टि की मूल प्रकृति के छठ अंश से षष्ठी देवी अर्थात छठी मैया की उत्पत्ति हुई थी, जिनको ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा जाता है।
छठ पर्व का सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व
इस त्योहार का भारतीय जीवन में विशेष स्थान है यह पर्व त्योहार सामाजिक-सांस्कृतिक समरसता को समृद्ध करने के साथ-साथ भाईचारा को बढ़ावा देते हुए धनी-निर्धन के अंतर, भेदभाव को भी पाटता है। यह चतुर्दिवसीय पर्व खाय-नहाय, खरना, संध्या-अर्ध्य तथा उषा-अर्ध्य का त्योहार है। इसमें शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ मानसिक शुद्धि पर भी बल दिया जाता है। इसमें अत्यधिक अनुशासन, संयम-नियम, शुचिता-पवित्रता का विशेष महत्व है। इनके पालना के अभाव में यह निष्फल माना जाता है।
यह पवित्र पर्व पर्यावरण संरक्षण, साफ-सफाई, स्वच्छ्ता का भी संदेश देता है। इस पर्व के मनाने से पहले लोग स्वेच्छया मिलजुलकर भाईचारा के साथ नदियों, तालाबों जलाशयों, उनके घाटों की विशेष रूप से साफ-सफाई, रंग-रोगन करते हैं। जलस्रोतों को जीवंत, प्रवाहमय, निर्मल रखना इस त्योहार को मनाने की अनिवार्य और महत्वपूर्ण शर्त और संदेष है। महान ऋषि-महर्षियों, समाज वैज्ञानिकों ने इस त्योहार के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया है कि मानव जीवन को उत्सवमय बनाने के लिए पर्यावरण को संरक्षित रखना अतिआवश्यक है। प्रकृति मनुष्य के साथ-साथ सभी जीवजन्तुओं की सहचरी है। इसके अभाव में जीवन अधूर-बदरंग तथा शून्य हो जाएगा।
भारत से विदेशों तक छठ पूजा का विस्तार
आज यह पर्व आज भारत के सर्वत्र प्रांतों में मनाये जाने के साथ विदेशों में मनाया जाने लगा है। जहां-जहां भी भारत मूल के लोग हैं वहां-वहां उसी पवित्रता, संयम-नियम, विधिविधान के साथ धूमधाम से मनाया जाने लगा है। इस त्योहार की वैज्ञानिकता, मानव जीवन के लिए अनिवार्यता, प्रकृति संरक्षण को बढावा देने के अन्तस दृष्टिकोण से विदेशी भी आश्चर्यचकित के साथ नतशिर हैं। आजकल इसके आयोजन में विदेशी लोग भी बढ़चढ़कर भागीदारी का निर्वहन कर रहे हैं।
लेखक: डा. जयशंकर
निवास: 6/120, विनीत खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ
संपर्क सूत्र: 6394192621
