सौरभ और आशुतोष जेल में, अभिजीत दीपके रिहा, जानें दिल्ली पुलिस ने क्या बताया कारण

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कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके को शनिवार को सशर्त जमानत मिल गई है। दिल्ली पुलिस ने उन्हें कनॉट प्लेस में आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से ठीक पहले हिरासत में लिया था। रिहा होने के बाद दीपके ने अपने दो अन्य साथियों—सौरभ दास और आशुतोष रांका—की तस्वीर शेयर करते हुए उनके जल्द आजाद होने की उम्मीद जताई।

हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि जब दीपके रिहा हो गए, तो दास और रांका अब भी तिहाड़ जेल में क्यों बंद हैं? दिल्ली पुलिस ने इसके पीछे ‘बार-बार कानून तोड़ने’ और ‘शांति भंग’ करने की गंभीर वजहें बताई हैं।

दीपके को क्यों मिली रिहाई?

शनिवार को अभिजीत दीपके को मंदिर मार्ग स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने पेश किया गया था। उन्हें 50,000 रुपये का बॉन्ड भरने और भविष्य में शांति भंग न करने का लिखित आश्वासन देने के बाद रिहा कर दिया गया।

अधिकारियों के मुताबिक, दीपके को रिहा करने का मुख्य कारण यह था कि वह प्रदर्शन स्थल (कनॉट प्लेस) पर पहुंचे ही नहीं थे, जबकि पुलिस ने उन्हें पहले ही हिरासत में ले लिया था।

रांका और दास का केस ज्यादा गंभीर क्यों?

सौरभ दास और आशुतोष रांका का मामला अलग है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, मनाही के बावजूद ये दोनों नेता छुपकर जंतर-मंतर पहुंच गए थे और वहां अशांति फैलाने की कोशिश की।

  • जंतर-मंतर पर अवैध प्रवेश: 13 अक्टूबर को दास, रांका, अजिंक्य शिंदे और 11 अन्य CJP सदस्य एक निजी संपत्ति फांदकर जंतर-मंतर में दाखिल हो गए। ध्यान रहे, 11 अक्टूबर को ही दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया था।

  • काम में बाधा: जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने कथित तौर पर अधिकारियों के काम में बाधा डाली।

  • ‘बार-बार अपराध’: पुलिस ने बताया कि 10 अक्टूबर को भी इन नेताओं ने 50,000 रुपये का ‘शांति बॉन्ड’ भरा था। लेकिन जंतर-मंतर की घटना के साथ उन्होंने उस बॉन्ड की शर्तों और BNSS की धारा 163 का उल्लंघन किया।

इसी आधार पर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने माना कि अगर इन्हें रिहा किया गया, तो ये दोबारा कानून तोड़ सकते हैं और दूसरों को उकसा सकते हैं। इसलिए दास और रांका को 5 दिन की न्यायिक हिरासत (तिहाड़ जेल) में भेज दिया गया।

पुलिस ने किन धाराओं का किया इस्तेमाल?

यह पूरी कार्रवाई हाल ही में लागू हुए नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत की गई है:

  • धारा 170: यह धारा पुलिस को किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) को रोकने के लिए किसी व्यक्ति को एहतियातन गिरफ्तार करने का अधिकार देती है।

  • धारा 126: यह कार्यकारी मजिस्ट्रेट को शांति बनाए रखने के लिए व्यक्ति से ‘पीस बॉन्ड’ (Peace Bond) मांगने का अधिकार देती है। इन धाराओं के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाता, बल्कि यह ‘निवारक कार्रवाई’ (Preventive Action) होती है।

नेहा बोरा को भी किया गया था रिहा

CJP नेताओं के अलावा, ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी शुक्रवार को एहतियातन हिरासत में लिया गया था। हालांकि, पुलिस ने दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत औपचारिकताएं पूरी कर उन्हें शनिवार तड़के रिहा कर दिया। बोरा को मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया क्योंकि धारा 65 के तहत पुलिस को सिर्फ मौके से हटाने का अधिकार होता है, मुकदमा दर्ज नहीं होता।

क्या है मूल विवाद?

यह सारा विरोध प्रदर्शन देश भर में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहा है। CJP, विपक्षी दल और छात्र संगठन इसे लेकर लामबंद हैं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि उसकी प्रक्रियाएं सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत हैं। वहीं, सत्ताधारी बीजेपी ने इन प्रदर्शनों को विदेशी फंडिंग और अराजकता फैलाने की कोशिश करार दिया है।