SC-ST Act पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘केवल शिकायतकर्ता के दलित होने से लागू नहीं होता एक्ट, जातिसूचक अपमान जरूरी’
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC-ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल शिकायतकर्ता के अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय से होने मात्र के आधार पर किसी भी मामले में एससी-एसटी एक्ट (SC-ST Act) के तहत अपराध तय नहीं किया जा सकता।
बिना जातिसूचक अपशब्दों के लागू नहीं होगा एक्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में जाति के आधार पर अपमानित करने या जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का स्पष्ट आरोप नहीं है, तो उन परिस्थितियों में एससी-एसटी एक्ट के तहत कोई अपराध नहीं बनता। अदालत ने साफ किया कि इस अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए कानूनी प्रावधानों और शर्तों का पूरी तरह से लागू होना अनिवार्य है।
अमरनाथ चौधरी को मिली बड़ी राहत
न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सिद्धार्थनगर जिले के इटवा थाने से जुड़े एक मामले में अमरनाथ चौधरी की अपील पर सुनवाई करते हुए की। अमरनाथ चौधरी ने विशेष न्यायाधीश द्वारा मामले का संज्ञान लेने और समन जारी करने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
क्या था पूरा मामला?
इस मामले की शुरुआत फर्जी जाति प्रमाणपत्र की शिकायत से हुई थी। आरोप था कि शिकायत के बाद विवाद बढ़ा और मारपीट की घटना हुई। पुलिस ने इस मामले में मारपीट के साथ-साथ एससी-एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी थीं।
हाईकोर्ट ने एफआईआर और मामले के तथ्यों की बारीकी से जांच की। अदालत ने पाया कि एफआईआर में कहीं भी स्पष्ट रूप से यह दर्ज नहीं है कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को जाति के आधार पर अपमानित किया हो या जातिसूचक अपशब्दों का इस्तेमाल किया हो। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अमरनाथ चौधरी को एससी-एसटी एक्ट के तहत लगे आरोपों से राहत दे दी और इस अधिनियम के तहत कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
मारपीट का मुकदमा रहेगा जारी हालांकि, हाईकोर्ट के इस आदेश से आरोपी को आंशिक राहत ही मिली है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एससी-एसटी एक्ट से भले ही राहत मिल गई हो, लेकिन मारपीट से जुड़े आरोपों पर निचली अदालत में कानूनी कार्रवाई और मुकदमा पहले की तरह जारी रहेगा।
