2027 की सियासी बिसात पर क्यों ‘नीले’ रंग के सहारे अखिलेश यादव
अखिलेश यादव का ‘नीला गमछा’ और समाजवादी छात्र सभा की नीली पोशाक—यह महज कोई रणनीतिक चमक-दमक या PDA समीकरण को धार देने वाला चतुर दांव नहीं है। यह अखिलेश यादव की मजबूरी है। 2027 के विधानसभा चुनाव में अगर समाजवादी पार्टी दोबारा सत्ता से दूर रह गई, तो न सिर्फ अखिलेश की राजनीतिक प्रासंगिकता खत्म हो सकती है, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बुरी तरह टूट जाएगा। लंबे समय से BSP की पहचान रहे नीले रंग को अपनाना, दलित मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश—यह सब उसी जद्दोजहद का हिस्सा है जिसमें सपा को अब कोई और विकल्प नहीं बचा।
2022 के आंकड़े बताते हैं कि सपा के लिए 2027 वाकई जिंदा रहने या राजनीतिक रूप से समाप्त होने का चुनाव बन चुका है। प्रदेश की 403 सीटों में 84 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इनके अलावा 15-20 सामान्य सीटें ऐसी हैं जहां दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कुल मिलाकर करीब 100 सीटें ऐसी हैं जहां थोड़ा-सा भी दलित वोट शिफ्ट होने पर नतीजे पलट सकते हैं। 2022 में 49 सीटें 5,000 से कम वोटों के अंतर से जीती-हारी थीं। इनमें से 25 पर सपा उम्मीदवार महज कुछ सौ या कुछ हजार वोटों से हारे थे—नकुड़ में 315, धामपुर में 203, चांदपुर में 234 और नहटौर (SC) में सिर्फ 258 वोट। अगर BSP या अन्य दलों का 5 प्रतिशत दलित वोट भी सपा की तरफ आता है तो कई सीटें पलट सकती हैं।
लेकिन यही आंकड़े अखिलेश के लिए खतरे की घंटी भी हैं। अगर ये वोट नहीं आए, तो दोबारा हार का मतलब होगा पार्टी की साख और कार्यकर्ताओं के विश्वास का और बड़ा नुकसान।84 आरक्षित सीटें—रामपुर मनिहारान, नगीना, हस्तिनापुर, मलिहाबाद, सलोन, मिल्कीपुर, महरौनी, बांसगांव, लालगंज जैसी जगहें—अब सपा के लिए परीक्षा नहीं, बल्कि आखिरी दांव की जमीन बन गई हैं। जाटव और गैर-जाटव दलितों (पासी, कोरी, खटीक, वाल्मीकि) के बीच अलग-अलग रणनीति बनानी पड़ेगी, क्योंकि एक ही फॉर्मूला अब काम नहीं करेगा। सामान्य सीटों जैसे नकुड़, देवबंद, चरथावल, धामपुर, बिजनौर, अलीगंज और इटावा पर भी दलित वोट का गणित सपा की मजबूरी को और बढ़ा रहा है। 5 प्रतिशत शिफ्ट से 15-25 सीटें संवेदनशील हो सकती हैं, 10 प्रतिशत से 30-45 सीटों का समीकरण बदल सकता है। लेकिन ये संभावनाएं अखिलेश के लिए उम्मीद नहीं, बल्कि दबाव हैं।
हार हुई तो न सिर्फ ये सीटें हाथ से निकलेंगी, बल्कि कार्यकर्ताओं में यह भावना घर कर जाएगी कि पार्टी अब वापसी की ताकत नहीं रखती।प्रतीकों से आगे हिस्सेदारी की चुनौती और भी कठिन है। नीला गमछा पहन लेना आसान है, लेकिन दलित नेताओं को सिर्फ आरक्षित सीटों तक सीमित न रखकर सामान्य सीटों पर टिकट देना, संगठन में वास्तविक हिस्सेदारी सुनिश्चित करना—यह सब अखिलेश को करना ही होगा, क्योंकि विकल्प नहीं है। 2024 में मिले गैर-जाटव समर्थन को बचाए रखना और जाटव समाज में पैठ बनाना अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुका है।
मायावती इसे BSP की पहचान पर अतिक्रमण बता सकती हैं और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी दलित युवाओं के बीच अपनी जगह बना रही है। इन दोनों चुनौतियों के बीच अखिलेश के पास नीले रंग का सहारा लेने के अलावा कोई आसान रास्ता नहीं बचा।2027 में सत्ता का रास्ता इन्हीं करीब 100 सीटों से होकर गुजरता है। अखिलेश यादव का यह नीला प्रयोग रणनीति से ज्यादा मजबूरी का प्रतीक है। अगर इस बार भी नतीजा निराशाजनक रहा, तो राजनीति खत्म होने और कार्यकर्ताओं के मनोबल टूटने का खतरा साफ दिख रहा है। नीला रंग अब सपा के लिए पहचान बदलने का हथियार नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने का आखिरी सहारा बन गया है।
