मंदिर की संपत्ति देवता की है, सरकार केवल संरक्षक है, मालिक नहीं’
देश भर के मंदिरों की संपत्ति के मालिकाना हक, संरक्षण और सरकारी नियंत्रण को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने तमिलनाडु के एक मंदिर विवाद की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि मंदिर की संपत्ति पर अंतिम अधिकार केवल और केवल ‘देवता’ (Deity) का होता है। सरकार, ट्रस्टी या पुजारी इसे अपनी निजी या सरकारी संपत्ति मानकर मनचाहे तरीके से हस्तांतरित (Transfer) नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने तमिलनाडु राज्य की एक इनाम भूमि (Inam Land) को उपहार (Gift Deed) के तौर पर सरकारी कार्यालय बनाने के लिए राज्य सरकार को देने की कार्रवाई को पूरी तरह से अमान्य करार दिया है।
‘दान की गई संपत्ति सिर्फ देवता में निहित’
पीठ ने मंदिर संपत्तियों की कानूनी स्थिति, ट्रस्टियों की जवाबदेही और राज्य की भूमिका की विस्तृत व्याख्या करते हुए कई अहम टिप्पणियां कीं:
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अदालत ने कहा कि एक बार जब कोई संपत्ति दान के जरिए देवता को समर्पित कर दी जाती है, तो वह दानदाता, पुजारी, ट्रस्टी या राज्य की नहीं रह जाती। वह संपत्ति सीधे तौर पर देवता में निहित हो जाती है।
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संपत्ति का प्रबंधन या देखरेख करने वाला व्यक्ति (चाहे वह ट्रस्टी ही क्यों न हो) उसका स्वामी (Owner) नहीं बन जाता। उसका दायित्व सिर्फ इस संपत्ति को देवता और धार्मिक उद्देश्यों के हित में सुरक्षित रखना होता है।
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कोई भी ट्रस्टी अपने पद का फायदा उठाकर मंदिर की संपत्ति को मनमाने ढंग से किसी दूसरे व्यक्ति या यहां तक कि सरकार को भी नहीं सौंप सकता।
‘सरकार सिर्फ संरक्षक है, मालिक नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की शक्तियों और सीमाओं को भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि मंदिर की संपत्ति का प्रशासन और नियमन (Regulation) करने की जिम्मेदारी सरकार को उसका ‘मालिक’ (Owner) नहीं बना देती। सरकार का दायित्व ऐसी संपत्तियों का संरक्षण करना है। वह केवल अपने प्रशासनिक अधिकारों के आधार पर मंदिर की जमीन को अपनी संपत्ति मानकर किसी सार्वजनिक उद्देश्य का हवाला देते हुए मुफ्त में हस्तांतरित (Free Transfer) नहीं कर सकती।
क्या था पूरा विवाद?
यह मामला तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित नागापलायम मरियम्मन-पोननाचियम्मन मंदिर से जुड़ा था। मंदिर के पास कोडुमुडी गांव में लगभग एक एकड़ 10 सेंट ‘इनाम भूमि’ थी।
अगस्त 2017 में मंदिर के एक अस्थायी ट्रस्टी ने नियमों को दरकिनार करते हुए यह जमीन ‘तालुक कार्यालय’ (Taluk Office) बनाने के लिए राज्य सरकार को उपहार (Gift Deed) में दे दी थी। राजस्व अधिकारियों ने भी इस जमीन का ट्रांसफर स्वीकार कर लिया था। इस फैसले को जब मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, तो मार्च 2019 में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सरकारी कार्यालय नहीं हटेगा, देना होगा किराया और हर्जाना
सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड (उपहार विलेख) को रद्द जरूर किया, लेकिन जमीन पर पहले से बन चुके ‘तालुक कार्यालय’ की इमारत को तोड़ने का आदेश नहीं दिया।
व्यावहारिक रुख अपनाते हुए अदालत ने राज्य सरकार को उस जमीन पर पट्टे (Lease) के आधार पर बने रहने की अनुमति दी है। हालांकि, पीठ ने सख्त निर्देश दिया कि सरकार को 8 मार्च 2019 से इस जमीन का 31,000 रुपये प्रतिमाह किराया मंदिर को चुकाना होगा। हर तीन साल में इस किराये की राशि की समीक्षा की जाएगी। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह मंदिर को कानूनी प्रक्रिया के लिए एक लाख रुपये का हर्जाना भी अदा करे।
