बड़े दलों की नैया पार लगाते हैं छोटे दल, 2017 और 2022 के आंकड़े दे रहे गवाही

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी पार्टी (SP), भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस जैसे बड़े दल अक्सर अपने दम पर चुनाव जीतने का दंभ भरते हैं। लेकिन जब जमीनी हकीकत और चुनावी नतीजों का विश्लेषण किया जाता है, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।

यूपी जैसे विशाल और जातिगत विविधता वाले राज्य में कुर्मी, राजभर, निषाद और जाट जैसी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे क्षेत्रीय दल बड़े राजनीतिक दलों के लिए सबसे मजबूत ‘बैसाखी’ का काम करते हैं। ये दल न केवल अपना कोर वोट बैंक ट्रांसफर करते हैं, बल्कि उन क्षेत्रीय गढ़ों में सेंध लगाने में मदद करते हैं जहां बड़े दल अकेले संघर्ष करते हैं। पिछले कुछ विधानसभा चुनावों के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि ये छोटे दल कभी-कभी सत्ता का पूरा समीकरण बदलने की ताकत रखते हैं।

2017 विधानसभा चुनाव: मोदी लहर और छोटे दलों का तड़का

साल 2017 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया था। पार्टी ने अकेले अपने दम पर 312 सीटें जीती थीं। हालांकि बीजेपी बिना गठबंधन के भी आसानी से सरकार बना सकती थी, लेकिन छोटे दलों के साथ गठबंधन ने उसके सामाजिक विस्तार और जीत के अंतर को काफी बड़ा कर दिया।

NDA गठबंधन का प्रदर्शन (2017):

  • अपना दल (सोनेलाल): 9 सीटें

  • सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP): 4 सीटें

  • निषाद पार्टी: 1 सीट

अपना दल ने पूर्वांचल और बुंदेलखंड में कुर्मी वोटबैंक को मजबूती से बीजेपी के पाले में किया, जबकि ओम प्रकाश राजभर की SBSP ने राजभर समुदाय को साधने में अहम भूमिका निभाई। इस गठबंधन के कारण NDA का कुल आंकड़ा 325 के पार पहुंच गया था।

2022 विधानसभा चुनाव: जब बैसाखियों ने बचाई सत्ता

2022 के चुनावों में बीजेपी की अपनी सीटें घटकर 255 रह गईं, जो बहुमत (202) से ज्यादा तो थीं, लेकिन 2017 के मुकाबले काफी कम थीं। इस चुनाव में सहयोगियों ने एक बार फिर पार्टी की नैया को मजबूत किया।

NDA का प्रदर्शन (2022):

  • अपना दल (सोनेलाल): 12 सीटें (2017 के मुकाबले 3 सीटों की बढ़ोतरी)

  • निषाद पार्टी: 6 सीटें

निषाद पार्टी पूर्वी यूपी के नदी किनारे बसे इलाकों में निषाद और मल्लाह वोटरों को बीजेपी की तरफ मोड़ने में पूरी तरह सफल रही। इन सहयोगियों की मदद से NDA का कुल आंकड़ा 273 तक पहुंच गया।

सपा गठबंधन का प्रदर्शन (2022): दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस बार छोटे दलों की ताकत को समझा और उनका सहारा लिया।

  • समाजवादी पार्टी: 111 सीटें (अकेले)

  • राष्ट्रीय लोक दल (RLD): 8 सीटें

  • सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP): 6 सीटें

सपा गठबंधन का कुल आंकड़ा 125 सीटों तक पहुंच गया। पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी की RLD का जाट वोट और पूर्वांचल में ओम प्रकाश राजभर की SBSP का राजभर वोट सपा के लिए निर्णायक साबित हुआ। कई करीबी सीटों पर इन दलों के वोट ट्रांसफर ने हार-जीत का अंतर तय किया।

यूपी में छोटे दल कैसे बनते हैं सत्ता की ‘बैसाखी’?

यूपी की राजनीति का यह स्थापित सत्य है कि कोई भी दल बिना जातीय समीकरण साधे सत्ता के शिखर तक नहीं पहुंच सकता। इन छोटे दलों का प्रभाव मुख्य रूप से चार कारकों पर निर्भर करता है:

  1. जातिगत वोटों का समेकन (Caste Consolidation): यूपी में कोई भी बड़ा राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दल अकेले सभी जातियों को नहीं साध सकता। छोटा दल अपनी मुख्य जाति (जैसे निषाद, कुर्मी, राजभर या जाट) को पूरी तरह से एक तरफ झुका देता है, जो चुनाव में एक मुश्त वोट बनकर गिरता है।

  2. मजबूत क्षेत्रीय पकड़: ये दल पूरे प्रदेश में चुनाव लड़ने के बजाय कुछ खास इलाकों में केंद्रित होते हैं। उदाहरण के लिए—RLD का प्रभाव पश्चिमी यूपी में, निषाद पार्टी का पूर्वी यूपी में और अपना दल का कुर्मी बहुल इलाकों में दबदबा है। बड़े दल इन क्षेत्रों में अकेले चुनाव लड़ने पर अक्सर कमजोर साबित होते हैं।

  3. वोट ट्रांसफर कराने की क्षमता: भारतीय राजनीति में गठबंधन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती वोट ट्रांसफर की होती है। यूपी में छोटे दल अपने समर्थकों का वोट बड़े दल के उम्मीदवार के खाते में ट्रांसफर कराने में माहिर होते हैं। कई विधानसभा सीटों पर हार-जीत का अंतर महज 5 से 15 हजार वोटों का होता है, और यही वोट बैंक उस अंतर को पाटता है।

  4. सौदेबाजी (Bargaining Power) की ताकत: चुनाव दर चुनाव अपनी अहमियत साबित कर चुके ये छोटे दल अब सौदेबाजी में भी माहिर हो गए हैं। ये दल अपनी सीटों की संख्या बढ़ाकर कैबिनेट में मंत्री पद या सत्ता में प्रभाव हासिल करते हैं। उदाहरण के तौर पर SBSP 2017 में बीजेपी के साथ थी, 2022 में सपा के साथ चली गई, लेकिन दोनों ही बार उसने सीटें जीतीं और सत्ता/विपक्ष में अहम जगह बनाई।

आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि 2017 में बीजेपी के सहयोगियों ने 14 सीटें दीं, वहीं 2022 में बीजेपी को 18 और सपा को सहयोगियों से 14 सीटें मिलीं। यूपी की राजनीति में बड़े दल भले ही ‘हाथी’ हों, लेकिन चुनावी वैतरणी पार करने के लिए उन्हें अपना दल, RLD, SBSP और निषाद पार्टी जैसी मजबूत ‘बैसाखियों’ की जरूरत हमेशा पड़ती है। यह दल बार-बार साबित करते हैं कि वे आकार में भले ही छोटे हों, लेकिन असल मायने में वे यूपी के ‘किंगमेकर’ हैं। आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों में भी इन्हीं दलों के इर्द-गिर्द सियासी बिसात बिछाई जाएगी।