EWS आरक्षण के नियमों में बदलाव की तैयारी, कृषि आय की शर्त हट सकती है
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण का लाभ लेने वाले सवर्ण परिवारों के लिए बड़ी राहत की खबर हो सकती है। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने संकेत दिए हैं कि केंद्र सरकार EWS आरक्षण के नियमों, विशेष रूप से कृषि आय और जमीन की सीमा से जुड़े प्रावधानों में बदलाव पर गंभीरता से विचार कर रही है।
हाल ही में इस संबंध में सरकार के स्तर पर एक अहम बैठक भी हुई है। शेखावत ने उम्मीद जताई है कि जल्द ही ऐसा समाधान निकलेगा जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के पात्र लोगों को ज्यादा न्याय मिल सके।
क्या हैं EWS के मौजूदा नियम और सवर्ण संगठनों की मांग?
वर्तमान नियमों के अनुसार, EWS आरक्षण (10% कोटा) का लाभ प्राप्त करने के लिए परिवार की कुल सालाना आय 8 लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस 8 लाख की सीमा में सैलरी, बिजनेस, प्रोफेशनल फीस और कृषि (खेती) से होने वाली आमदनी—सभी को शामिल किया जाता है। इसके अलावा, एक शर्त यह भी है कि परिवार के पास 5 एकड़ से अधिक कृषि भूमि नहीं होनी चाहिए।
सवर्ण समाज के कई संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि EWS की पात्रता से ‘5 एकड़ कृषि भूमि’ और ‘खेती की आय’ वाले प्रावधान को हटाया जाए। उनका तर्क है कि कृषि भूमि का रकबा (आकार) ज्यादा होने का मतलब यह नहीं है कि पैदावार और कमाई भी अच्छी हो रही हो। कई बार जमीन बंजर या कम उपजाऊ होती है, ऐसे में 5 एकड़ भूमि किसी भी परिवार की आर्थिक मजबूती का पैमाना नहीं हो सकती। यदि खेती की आय और जमीन की शर्त हटती है, तो ग्रामीण परिवारों को EWS प्रमाण पत्र बनवाने में बड़ी राहत मिलेगी।
खेती पर निर्भर परिवारों के साथ न्याय की कोशिश
जोधपुर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि मौजूदा नियमों के कारण कई ऐसे ग्रामीण परिवार EWS के लाभ से वंचित रह जाते हैं, जिनकी आजीविका पूरी तरह से केवल खेती पर निर्भर है। उन्होंने माना कि कई परिवारों के पास जमीन तो है, लेकिन उनकी वास्तविक आय बेहद सीमित है। ऐसे मामलों में मौजूदा शर्तें उनके साथ न्याय नहीं कर पाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने से रुकी थी प्रक्रिया
शेखावत ने बताया कि कृषि आय को EWS से बाहर रखने का मुद्दा सरकार के स्तर पर पहले भी उठाया गया था। हालांकि, ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ की एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण इस पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका था। अब चूंकि यह मामला सुलझ चुका है, इसलिए सरकार इसके विभिन्न पहलुओं पर नए सिरे से विचार कर रही है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ राज्य सरकारें मौजूदा नियमों में बदलाव के पक्ष में नहीं हैं, इसलिए केंद्र सरकार पूरे देश के हितों और परिस्थितियों का आकलन करने के बाद ही कोई अंतिम फैसला करेगी।
राजस्थानी भाषा की मान्यता पर भी चर्चा
इस दौरान शेखावत ने राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कर संवैधानिक मान्यता देने के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि राजस्थान के सम्मान का विषय है। उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय के पास वर्तमान में विभिन्न भाषाओं को मान्यता देने से जुड़े 32 से अधिक प्रस्ताव लंबित हैं और सरकार इस दिशा में काम कर रही है।
