आराधना मिश्रा और इमरान मसूद के जरिए कांग्रेस ने चला ‘ब्राह्मण-मुस्लिम’ कार्ड; 2027 के लिए ये है नई रणनीति
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस (Congress) ने अपने प्रदेश संगठन में बड़ा और रणनीतिक बदलाव किया है। रामपुर खास से तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ (Aradhana Mishra ‘Mona’) को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जबकि सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद (Imran Masood) को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया गया है।
इस नई टीम को महज एक संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि कांग्रेस के पारंपरिक ‘ब्राह्मण-मुस्लिम’ वोट बैंक को वापस लाने की एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
आराधना मिश्रा: ब्राह्मण और महिला वोट बैंक पर नजर
कांग्रेस के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा का प्रदेश अध्यक्ष बनना कई मायनों में अहम है:
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ब्राह्मण चेहरे की वापसी: यूपी की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं का खासा प्रभाव है। रीता बहुगुणा जोशी (2007-2012) के बाद लगभग डेढ़ दशक बाद कांग्रेस ने फिर किसी ब्राह्मण महिला नेता को प्रदेश की कमान सौंपी है।
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जमीनी अनुभव: ब्लॉक प्रमुख से राजनीतिक सफर शुरू करने वाली आराधना मिश्रा ने 2014 (उपचुनाव), 2017 और 2022 में रामपुर खास सीट से लगातार जीत दर्ज की है। उनके जरिए कांग्रेस ब्राह्मणों के साथ-साथ महिला मतदाताओं (आधी आबादी) को भी साधने का प्रयास कर रही है।
इमरान मसूद: पश्चिमी यूपी और मुस्लिम मतों की लामबंदी
सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने सीधे तौर पर अल्पसंख्यक (मुस्लिम) वोट बैंक को संदेश दिया है:
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पश्चिमी यूपी का प्रभाव: इमरान मसूद का पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं पर अच्छा खासा प्रभाव है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से उनकी जीत इसका प्रमाण है।
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सपा से तालमेल में आसानी: इमरान मसूद का समाजवादी पार्टी के साथ भी पुराना जुड़ाव रहा है। वह सपा और कांग्रेस के रिश्तों पर बेबाकी से राय रखते हैं। उनका यह अनुभव 2027 में ‘इंडिया’ गठबंधन के तहत सीट बंटवारे में मददगार साबित हो सकता है।
सपा के ‘PDA’ फॉर्मूले के साथ तालमेल
कांग्रेस की यह नई ‘सोशल इंजीनियरिंग’ सिर्फ ब्राह्मण-मुस्लिम तक सीमित नहीं है। देवेंद्र निषाद (OBC) और आलोक प्रसाद (दलित) को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने पिछड़ों और दलितों को भी प्रतिनिधित्व दिया है।
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कांग्रेस का यह दांव समाजवादी पार्टी के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के पूरक के तौर पर देखा जा रहा है।
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आराधना मिश्रा और प्रमोद तिवारी के समाजवादी पार्टी नेतृत्व के साथ अच्छे राजनीतिक रिश्ते हैं, जिससे आगामी चुनावों में दोनों दलों के बीच समन्वय स्थापित करना आसान होगा।
जमीन पर उतारने की चुनौती
कांग्रेस लंबे समय से यूपी में अपने खोए हुए पारंपरिक जनाधार (ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम) को वापस पाने की जद्दोजहद कर रही है। नई नियुक्तियों से एक मजबूत सामाजिक समीकरण का खाका तो खिंच गया है, लेकिन कांग्रेस के सामने असली चुनौती इसे बूथ स्तर पर उतारने की है। 2027 के महामुकाबले में यह देखना दिलचस्प होगा कि आराधना मिश्रा और इमरान मसूद की जोड़ी पार्टी के इस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को वोटों में कितना तब्दील कर पाती है।
