September 15, 2026

बुआ जी को डर क्यों लगा? आकाश आनंद पर बच्चों की बात में छिपा 2027 का बड़ा सवाल

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आज एक मजेदार वाकया हुआ। कुछ बच्चे मिले। मेरे लिए तो बच्चे ही हैं, लेकिन अब उन्हें एक नई पहचान दी जा चुकी है। नाम है Gen Z।

बात शुरू हुई शॉर्ट वीडियो, कोरियन ड्रामा और रील्स से। फिर पता नहीं बातचीत ने कब राजनीति की गली पकड़ ली। और देखते ही देखते बहस पहुंच गई बहुजन समाज पार्टी और आकाश आनंद तक।

फुजैल ने कहा, “मायावती को आकाश को पार्टी से निकालना नहीं चाहिए था।”

मैंने सोचा, अच्छा… मामला यहां तक पहुंच चुका है।

फुजैल ने आगे बताया कि जब से आकाश आनंद राजनीति में सक्रिय हुए, वह उनके वीडियो देखते रहे हैं। उन्हें यह बात अच्छी लगी कि आकाश की भाषा और सोच उन्हें “आम लड़के” जैसी लगती है। उनके मुताबिक आकाश की कोशिश युवाओं को पार्टी से जोड़ने की दिखाई देती थी।

फिर उसने वही सवाल कर दिया, जो शायद इस समय BSP के बाहर भी बहुत लोग पूछ रहे हैं।

“लेकिन समझ नहीं आया, ऐसा क्यों हुआ?”

इतने में गोविन्द ने बात काट दी। उसका जवाब और भी दिलचस्प था।

“बुआ जी को डर लग रहा होगा कि कहीं वो लड़का हमको घर न बैठा दे और लालकृष्ण आडवाणी बना दे।”

बस फिर क्या था। सब हंसने लगे।

राजा चुपचाप बैठा था। उसने थोड़ी देर बाद कहा, “राजनीति में कोई किसी का नहीं होता। सबको डर लगता है। बुआ जी को भी डर लग रहा है।”

उसने यह बात ऐसे कही जैसे अभी-अभी कोई राजनीतिक दर्शन की किताब बंद करके आया हो।

लेकिन मजाक के बीच उसकी बात रुक गई दिमाग में। क्योंकि इन बच्चों की बातचीत में सिर्फ हंसी नहीं थी। उसमें राजनीति को देखने का एक नया तरीका भी था।

रील्स देखने वाली पीढ़ी राजनीति भी देख रही है

हम अक्सर Gen Z को लेकर एक तय धारणा बना लेते हैं। उन्हें मोबाइल चाहिए, शॉर्ट वीडियो चाहिए, कोरियन ड्रामा चाहिए, इंस्टाग्राम चाहिए और हर चीज का जवाब 30 सेकंड में चाहिए। लेकिन यह तस्वीर अधूरी है।

आज की युवा पीढ़ी राजनीति को भी देख रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि वह राजनीति को हमेशा भाषणों और अखबारों के संपादकीय पन्नों से नहीं समझती।

वह नेताओं के छोटे वीडियो देखती है। उनकी भाषा नोट करती है।

कौन किससे लड़ रहा है, कौन किसको पार्टी से निकाल रहा है, कौन किस मुद्दे पर सड़क पर उतर रहा है और कौन सोशल मीडिया पर क्या कह रहा है, यह सब उसकी राजनीतिक स्मृति का हिस्सा बन रहा है। आकाश आनंद का मामला इसका एक दिलचस्प उदाहरण है।

मायावती ने पहले उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां दीं, फिर हटाया, फिर वापसी हुई और अब एक बार फिर उन्हें पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है। 3 सितंबर को उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारी से हटाया गया था और 10 सितंबर को मायावती ने उन्हें पार्टी से पूरी तरह अलग करने की घोषणा की।

यानी एक युवा राजनीतिक चेहरा बार-बार सामने आया और फिर राजनीतिक मंच से पीछे कर दिया गया। युवाओं के लिए यह स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है।

सवाल सिर्फ आकाश आनंद का नहीं है

फुजैल का सवाल सिर्फ यह नहीं था कि आकाश आनंद को पार्टी से क्यों निकाला गया। असल सवाल यह था कि जब कोई युवा नेता युवाओं को जोड़ने की कोशिश करता दिखाई देता है, तो फिर उसके साथ ऐसा क्यों होता है?

यह सवाल मायावती के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि BSP इस समय सिर्फ अपनी सीटों की लड़ाई नहीं लड़ रही। उसके सामने यह चुनौती भी है कि वह नई पीढ़ी को अपने साथ कैसे जोड़े।

आकाश आनंद को कभी मायावती के संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाया गया था। लेकिन उनके राजनीतिक सफर में पिछले दो वर्षों के दौरान जिम्मेदारी मिलने, हटाए जाने, वापस आने और फिर हटाए जाने के कई मोड़ आए हैं।

अब कहानी में एक और नाम आ गया है। ईशान आनंद।

आकाश के छोटे भाई ईशान को हाल के संगठनात्मक बदलावों में प्रमुखता मिलती दिखाई दी है। सितंबर की शुरुआत में मायावती ने उन्हें पार्टी के नेताओं के सामने प्रमुखता से पेश किया था। यानी BSP के भीतर आने वाले समय की राजनीति को लेकर चर्चा सिर्फ आकाश के इर्द-गिर्द नहीं रहेगी।

“बुआ जी को डर लगा होगा” में छिपा असली सवाल

गोविन्द का मजाक राजनीतिक विज्ञान की किताब में शायद कहीं जगह न पाए, लेकिन राजनीति को समझने के लिए उसमें एक दिलचस्प सवाल जरूर छिपा है। क्या किसी पार्टी में युवा नेतृत्व का उभरना हमेशा मौजूदा नेतृत्व के लिए आसान होता है? या फिर हर पार्टी में एक ऐसा क्षण आता है, जब अगली पीढ़ी की लोकप्रियता और मौजूदा नेतृत्व की पकड़ के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है?

बेशक, यह कहना कि मायावती ने आकाश को किसी व्यक्तिगत डर के कारण हटाया, एक अनुमान होगा। मायावती ने अपने फैसले की वजह पार्टी और बहुजन आंदोलन के हित तथा आकाश के “डबल माइंडेड” रवैये से जुड़ी बताई है। उन्होंने यह भी कहा कि आकाश के पारिवारिक रिश्तों का मोह पार्टी हित पर भारी पड़ रहा था।

लेकिन राजनीति में फैसले की आधिकारिक वजह और उसके राजनीतिक असर, दोनों अलग-अलग चीजें होती हैं। और यही वह जगह है जहां Gen Z के सवाल दिलचस्प हो जाते हैं।

बच्चे बड़े हो रहे हैं, उनकी राजनीतिक याददाश्त भी

राजा की एक बात फिर याद आती है। “राजनीति में कोई किसी का नहीं होता।” उसने यह बात मजाक में कही थी या दर्शन में, पता नहीं। लेकिन आने वाले चुनावों के लिहाज से यह वाक्य काफी गंभीर है।

आज जो बच्चे नेताओं के वीडियो देख रहे हैं, इनमें से कोई विधानसभा चुनाव लड़ेगा, कोई संसद में जाएगा, कोई राजनीतिक अभियान चलाएगा और कोई शायद किसी पार्टी की सोशल मीडिया रणनीति बनाएगा।

इसलिए उन्हें सिर्फ “बच्चे” समझकर राजनीति से बाहर मान लेना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। वे अभी वोटर नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक दर्शक जरूर हैं। और राजनीतिक दर्शक धीरे-धीरे राजनीतिक मतदाता बनता है।

2027 में सिर्फ मायावती की परीक्षा नहीं होगी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में BSP के सामने चुनौती सिर्फ सीटें जीतने की नहीं होगी। उसे अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करनी होगी। एक तरफ मायावती का लंबा राजनीतिक अनुभव और बहुजन आंदोलन की विरासत है।

दूसरी तरफ नई पीढ़ी के सामने चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता हैं, जो सड़क, सोशल मीडिया और आक्रामक राजनीतिक भाषा के जरिए अपनी अलग जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे माहौल में सवाल यह नहीं है कि Gen Z को राजनीति में दिलचस्पी है या नहीं। आज की असली बात यह है कि Gen Z किस तरह की राजनीति से जुड़ना चाहती है।

फुजैल को आकाश आनंद में “अपने जैसा लड़का” दिखाई दिया। गोविन्द ने उसमें सत्ता और उत्तराधिकार की कहानी देख ली। राजा ने पूरी राजनीति को दो वाक्यों में समेट दिया। और बाकी सब हंसते रहे। लेकिन उस हंसी के बीच एक गंभीर सवाल खड़ा हो चुका था।

क्या पुरानी राजनीति नई पीढ़ी को अपने तरीके से समझा पाएगी, या नई पीढ़ी अपने सवालों के साथ राजनीति का तरीका ही बदल देगी?

2027 का चुनाव शायद इस सवाल का पहला बड़ा जवाब देगा।

लेखक आशीष शर्मा सीनियर जर्नलिस्ट हैं।