September 15, 2026

वंदे मातरम पर क्यों बोलीं गीतांजलि आंग्मो- ‘यह सिर्फ गीत नहीं’?

Geetanjali Angmo

जाने-माने एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने ‘वंदे मातरम’ के मूल भाव, भारतीय संस्कृति, देश में जारी राजनीतिक विमर्श और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर विस्तृत राय रखी है। उन्होंने देश में पनप रही ‘गुलामी मानसिकता’ पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि पश्चिमी दार्शनिकों ने भारतीय ग्रंथों से विचार लिए, लेकिन भारत आज भी उन्हीं के तैयार किए गए विदेशी ढांचे का पालन कर रहा है। आंग्मो ने समाज में राजनीतिक दलों द्वारा फैलाए जा रहे बंटवारे के नैरेटिव पर भी तीखा प्रहार किया है।

‘वंदे मातरम’ और भारत का मूल भाव ‘वंदे मातरम’ के महत्व को समझाते हुए आंग्मो ने कहा कि यह सिर्फ एक भौतिक भू-भाग का विषय नहीं है, बल्कि ‘शक्ति’ और एक जीवित सत्ता का प्रतीक है। उन्होंने कहा, “वंदे मातरम का मूल भाव है- हे मां, मैं आपको नमन करती हूं। हमने दस हजार साल तक इसे मां के रूप में देखा है, इसलिए हम इसे छोड़ नहीं सकते।”

आजादी के दिन लाल किले से इसके गाए जाने को उन्होंने एक स्वागत योग्य कदम बताया। उनके मुताबिक, एक राष्ट्रीय गीत के तौर पर यह हमेशा से मौजूद था, लेकिन लोगों की यादों से मिटता जा रहा था। इसे लाल किले से गाए जाने में 80 साल लग गए। उन्होंने दार्शनिक श्री अरबिंदो का हवाला देते हुए कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी सिर्फ एक उपन्यासकार नहीं, बल्कि एक ऋषि थे। आंग्मो ने यहां तक कहा कि अगर हमें इस जीवित सत्ता की समझ पहले होती, तो शायद आज भारत के बंटवारे की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता।

राजनीतिक एजेंडे और सांस्कृतिक विविधता हिंदू संस्कृति और राजनीति से पैदा हुए बंटवारे के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि जब राजनीति अपने एजेंडे के लिए सार्वजनिक जीवन में आती है, तो समस्याएं जन्म लेती हैं। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि आम लोगों के बीच उतनी समस्या है, जितनी कभी-कभी राजनीतिक एजेंडे के कारण बनाई गई बात या नैरेटिव से राजनेता लोगों को बांटने वाली सोच को बढ़ावा देते हैं।”

विविधता का उदाहरण देते हुए उन्होंने समाज की तुलना एक ‘बॉटनिकल गार्डन’ से की, जहां हर फूल का रंग, आकार और खुशबू अलग होती है। उन्होंने कहा कि मोनोकल्चर खेती में भी एक गलत तरीका है। आंग्मो ने जोर देकर कहा कि 10,000 साल पुरानी अपनी संस्कृति को दिखाने में झिझकना नहीं चाहिए। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का जिक्र किया, जिन्होंने उपनिषद और गीता पढ़ी थी, और खुद का उदाहरण देते हुए बताया कि वह सूफी कविताएं पढ़ती हैं। उनके अनुसार, संस्कृत बोलने या गीता पढ़ने से किसी मुसलमान का धर्म भ्रष्ट नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे उर्दू बोलने से किसी हिंदू का नहीं होता।

‘औपनिवेशिक मानसिकता’ और पश्चिमी दर्शन भारत में विदेशी प्रभावों और वर्तमान ढांचे पर बोलते हुए आंग्मो ने कहा कि देश में आज भी शिक्षा, अर्थव्यवस्था और विज्ञान के क्षेत्र में औपनिवेशिक मानसिकता हावी है। उन्होंने कहा कि यूरोप में हुए पुनर्जागरण के दौरान कई पश्चिमी वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने भारतीय ग्रंथ पढ़े और उनसे विचार लिए।

उन्होंने बताया, “ओपनहाइमर ने गीता पढ़ी, आइंस्टीन ने उपनिषद पढ़े, प्लेटो और कई पश्चिमी दार्शनिकों ने भारतीय ग्रंथ पढ़े। लेकिन उन्होंने उन्हें अपनी थ्योरी के तौर पर पेश किया और हमने उसी ‘सेकंड-हैंड’ वर्शन को स्वीकार कर लिया।”

शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की मांग शिक्षा में भारतीय दर्शन को शामिल करने की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि अगर हम क्वांटम फिजिक्स पढ़ते हैं, तो ‘वैशेषिक’ क्यों नहीं और अगर तर्कशास्त्र पढ़ते हैं, तो ‘न्याय’ क्यों नहीं पढ़ाया जाता। उन्होंने मांग की कि देश के हर बच्चे को 10वीं कक्षा तक एक जैसी बुनियादी शिक्षा मिलनी चाहिए, चाहे वह सरकारी स्कूल हो या प्राइवेट। उन्होंने वर्तमान परीक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठाए और कहा कि यह जांचना जरूरी है कि हम छात्रों की सिर्फ याददाश्त परख रहे हैं या उनकी समझ और लागू करने की क्षमता को भी आंक रहे हैं।

ओडिशा की जन्मभूमि और श्री अरबिंदो का प्रभाव अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए आंग्मो ने बताया कि ओडिशा उनकी जन्मभूमि है और वहीं से उन्हें दुनिया देखने का नजरिया मिला। बचपन में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विभिन्न विचारधाराओं को समझने में उन्हें मुश्किल होती थी। ऐसे में ओडिशा में रचे-बसे श्री अरबिंदो के दर्शन ने उन्हें वह मंच दिया, जिससे वे लेफ्ट बनाम राइट, समाजवाद बनाम पूंजीवाद जैसे पश्चिमी ढांचों के पार जाकर चीजों को समझ सकीं। उन्होंने कहा कि एक आदर्श समाज तभी बनता है, जब हर व्यक्ति को अपने सबसे गहरे सच को ईमानदारी से जाहिर करने की आजादी हो।