पाबंदियों से ‘अग्नि-5’ तक, कैसे डॉ. कलाम ने गढ़ी भारत की मिसाइल ताकत?
नई दिल्ली : 22 मई 1989 को ओडिशा के चांदीपुर कोस्ट से उड़ी मिसाइल महज एक रॉकेट नहीं थी, बल्कि यह मिलिट्री सुपरपावर की ओर कदम बढ़ाते भारत की पहली हुंकार थी। जब भारत के पहले ‘अग्नि टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर’ (Agni-TD) ने आसमान का सीना चीरा, तो वॉशिंगटन के पेंटागन से लेकर बीजिंग तक खलबली मच गई। 37 साल पहले शुरू हुआ भारत की बैलिस्टिक मिसाइल ‘अग्नि’ का यह सफर पश्चिमी देशों की पाबंदियों, वैज्ञानिकों की जिद और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के विजन की एक बेजोड़ कहानी है।
पाबंदियों की बेड़ियां और डॉ. कलाम की जिद
1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के मिसाइल प्रोग्राम (IGMDP) की कमान डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को सौंपी। उस समय अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भारत को मिसाइल तकनीक देने पर सख्त पहरा बिठा रखा था। 1989 में जब अग्नि का पहला टेस्ट हुआ और इसने 1000 किमी दूर अचूक निशाना लगाया, तो दुनिया सन्न रह गई।
इसके तुरंत बाद अमेरिका और यूरोप ने भारत पर कंप्यूटर चिप्स से लेकर कार्बन कंपोजिट तक क्रिटिकल पार्ट्स की सप्लाई पर बैन लगा दिया। लेकिन डीआरडीओ (DRDO) के वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी। देश की टॉप यूनिवर्सिटीज और प्राइवेट कंपनियों को साथ जोड़कर भारत ने नेविगेशन सिस्टम, ऑन-बोर्ड कंप्यूटर और स्पेशल मैरेजिंग स्टील देश में ही तैयार कर डाला। यहीं से अग्नि मिसाइलों की उस सीरीज की नींव पड़ी, जिसने भारत के डिफेंस को अभेद्य बना दिया।
अग्नि सीरीज के ब्रह्मास्त्र और उनकी ताकत
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अग्नि-1: 1999 के करगिल युद्ध के दौरान महसूस की गई जरूरत से अग्नि-1 का जन्म हुआ। 2002 में टेस्ट की गई यह सिंगल-स्टेज सॉलिड फ्यूल मिसाइल 700 से 1200 किमी तक मार कर सकती है और 1000 किलो का न्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने में सक्षम है।
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अग्नि-2: चीन की चुनौती से निपटने के लिए डीआरडीओ ने अग्नि-2 तैयार की। 1999 में टेस्ट की गई इस मिसाइल की रेंज 2000 से 2500 किमी है। इसमें री-एंट्री के वक्त 3000°C गर्मी झेलने वाली स्पेशल कार्बन हीट शील्ड लगी है।
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अग्नि-3: चीन के अंदरूनी इलाकों तक मार करने के लिए बनाई गई अग्नि-3 की रेंज 3,500 से 5,000 किमी है। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसके ‘पेनेट्रेशन एड्स’ हैं, जो रास्ते में डमी टारगेट छोड़कर दुश्मन के रडार को धोखा दे सकते हैं।
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अग्नि-4: यह मिसाइल भारतीय तकनीक में गेम-चेंजर साबित हुई। 2011 में टेस्ट की गई इस मिसाइल में पारंपरिक लोहे की जगह सुपर-लाइट कंपोजिट मटीरियल का इस्तेमाल हुआ, जिससे इसकी एक्यूरेसी बेहद सटीक हो गई।
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अग्नि-5: 19 अप्रैल 2012 को भारत ने 5000 किमी से ज्यादा रेंज वाली अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया। इसका ‘कैनिस्टर सिस्टम’ इसे सबसे घातक बनाता है। इसे सीलबंद कंटेनर में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है और मिनटों में फायर किया जा सकता है। इसके जद में पूरा चीन, आधा यूरोप और अफ्रीका शामिल हैं।
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अग्नि-प्राइम: 2021 में टेस्ट की गई यह नेक्स्ट-जेनरेशन मिसाइल (रेंज: 1000-2000 किमी) पुरानी अग्नि-1 और 2 का एडवांस रिप्लेसमेंट है। यह बेहद हल्की है और कुछ ही पलों में दुश्मन के ठिकानों को तबाह करने की क्षमता रखती है।
अग्नि सीरीज की मारक क्षमता (एक नजर में)
| मिसाइल | मारक क्षमता | स्टेज / फ्यूल टाइप | वजन (टन) |
| अग्नि-1 | 700 – 1,200 किमी | 1-स्टेज (ठोस) | 12 |
| अग्नि-2 | 2,000 – 2,500 किमी | 2-स्टेज (ठोस) | 16 |
| अग्नि-3 | 3,500 – 5,000 किमी | 2-स्टेज (ठोस) | 50 |
| अग्नि-4 | 3,500 – 4,000 किमी | 2-स्टेज (कंपोजिट/ठोस) | 17 |
| अग्नि-5 | 5,000+ किमी | 3-स्टेज (कैनिस्टराइज्ड) | 50 |
| अग्नि-प्राइम | 1,000 – 2,000 किमी | 2-स्टेज (नेक्स्ट-जेन) | सुपर-लाइट |
| अग्नि-6 (प्रस्तावित) | 8,000 – 12,000 किमी | 3/4-स्टेज (MIRV/MaRV) | 65-70 |
