September 15, 2026

Chaturmas Tirth Yatra Rules: क्या चातुर्मास में तीर्थ यात्रा करना गलत है? जानिए असली नियम

chaturmas teerth yatra

chaturmas teerth yatra

Chaturmas Tirth Yatra Rules: हिंदू धर्म में वर्षा ऋतु के आसपास आने वाले चार महीनों को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है। इन्हीं महीनों को चातुर्मास कहा जाता है। हालांकि, कुछ दशक पहले तक चातुर्मास के दौरान लंबी दूरी की यात्रा करना आसान नहीं था। विशेष रूप से साधु-संत इस समय अपना भ्रमण रोक देते थे और एक ही स्थान पर निवास करते थे। बारिश के मौसम में यात्रा रोकने के पीछे प्रकृति और सेहत से जुड़े कौन से कारण थे? और क्या चातुर्मास के दौरान तीर्थ यात्रा करना उचित माना जाता है? आइए इसके बारे में जानते हैं।

चातुर्मास किसे कहते हैं और यह कब से माना जाता है?

चातुर्मास का शाब्दिक अर्थ ही है चार महीनों की अवधि। हिंदू पंचांग के अनुसार इसका संबंध सामान्यतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक की अवधि से जोड़ा जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी और कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है।

धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और देवउठनी एकादशी के आसपास उनका जागरण होता है। इसी वजह से इन चार महीनों को भगवान विष्णु के विश्राम से जोड़कर देखा जाता है।

चातुर्मास में लोग संतों से सीखते थे जीवन से जुड़ी जरुरी बातें

चातुर्मास में कई लोग अपनी कैपेसिटी और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत, उपवास, सात्त्विक भोजन, जप, ध्यान और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन का संकल्प लेते हैं। इसी कारण इस अवधि में कथा, सत्संग, प्रवचन, शास्त्र-अध्ययन और सामूहिक धार्मिक गतिविधियों की परंपरा विकसित हुई। मतलब, जहां साल के बाकी हिस्से में साधु-संत लोगों तक पहुंचते थे, वहीं चातुर्मास में लोग उनके पास जाकर धर्म और जीवन से जुड़ी बातें सीखते थे।

चातुर्मास में स्वास्थ्य से जुड़ी क्या सावधानियां थीं?

चातुर्मास की परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष सेहत और खान-पान से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। भारतीय आयुर्वेदिक परंपरा में वर्षा ऋतु को पाचन और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के संदर्भ में संवेदनशील मौसम माना गया है। बरसात के दौरान वातावरण में नमी बढ़ती है और भोजन तथा पानी के दूषित होने की संभावना भी रहती है।

ऐसे में लंबी यात्रा करना स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकता था। यात्री को अलग-अलग स्थानों का पानी पीना पड़ता था, रास्ते में भोजन की क्वालिटी का भरोसा नहीं होता था और खराब मौसम में शरीर पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता था।

चातुर्मास में खान-पान से जुड़ी परंपराएं भी

चातुर्मास के दौरान उपवास या कुछ खाने वाली चीजों से परहेज जैसी परंपराएं भी देखने को मिलती हैं। इनके नियम सभी जगह समान नहीं हैं, लेकिन मूल विचार शरीर और मन को संयमित रखने का है। जब बाहर की गतिविधियां कम होती हैं और भोजन भी नियंत्रित किया जाता है, तो व्यक्ति अपनी दिनचर्या को अधिक व्यवस्थित बना सकता है।

क्या आज चातुर्मास में तीर्थ यात्रा करना गलत माना जाता है?

आधुनिक समय में चातुर्मास के दौरान तीर्थ यात्रा का स्वरूप पहले से काफी बदल गया है। अब लोग कुछ घंटों में या एक-दो दिनों में उन स्थानों तक पहुंच सकते हैं, जहां पूर्व के समय में यात्रियों को कई दिन या सप्ताह लगते थे।

सड़क, रेल और हवाई परिवहन ने दूरी की चुनौती को काफी कम कर दिया है। यही वजह है कि सावन, जन्माष्टमी और अन्य धार्मिक पर्वों के दौरान अनेक प्रमुख तीर्थ स्थलों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

आज के समय में चातुर्मास का अर्थ हर प्रकार की यात्रा पर पूर्ण रोक नहीं रह गया है। कुछ साधु-संन्यासी अब भी चातुर्मास के दौरान एक स्थान पर रहने की परंपरा का कठोरता से पालन करते हैं। वहीं सामान्य गृहस्थों के लिए यह अलग हो सकता है।

चातुर्मास में यात्रा करना सही है या गलत, निष्कर्ष निकालने के बजाए मूल भाव को समझा जाए। यदि कोई व्यक्ति तीर्थ यात्रा करता है, तो उसे मौसम, स्वास्थ्य, स्थानीय नियमों और धार्मिक अनुशासन का ध्यान रखना चाहिए।

ये भी पढ़ें-

परिसीमन पर खरगे का PM मोदी को पत्र, ऑल-पार्टी मीटिंग बुलाने की मांग

कपिल देव की ऑलटाइम T20 टीम ने चौंकाया, एक भी भारतीय को नहीं चुना