मुंबई की रसोई का बिगड़ा बजट: सूखे की मार से आसमान पर सब्जियों के दाम, 15 दिनों में 20 रुपये तक का उछाल

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अगर आप मुंबई या इसके आसपास के इलाकों में रहते हैं, तो रोजमर्रा की सब्जियां खरीदना अब आपकी जेब पर भारी पड़ने वाला है। मुंबई के रिटेल बाजारों में सब्जियों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे आम आदमी की थाली से हरी सब्जियां दूर होने लगी हैं। पिछले महज 15 दिनों के भीतर शहर में सब्जियों के भाव में औसतन 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक का बड़ा उछाल दर्ज किया गया है।

सूखे और कम आवक ने बिगाड़ा खेल

सब्जियों की कीमतों में आई इस अचानक तेजी के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण सामने आए हैं।

सबसे बड़ी वजह महाराष्ट्र के अधिकांश हिस्सों में पड़ा सूखा (Drought) है। पानी की कमी के कारण किसानों की फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। खेत में फसल खराब होने का सीधा असर मुंबई की थोक मंडियों पर पड़ा है। APMC जैसी प्रमुख थोक मंडियों में सब्जियों की आवक (Supply) काफी कम हो गई है। बाजार में सब्जियों की मांग तो पहले की तरह बरकरार है, लेकिन सप्लाई घटने से पैदा हुए इस अंतर के कारण खुदरा व्यापारियों को कीमतें बढ़ानी पड़ रही हैं।

खुदरा बाजार में सब्जियों के ताज़ा भाव

सप्लाई में कमी के चलते मुंबई के रिटेल मार्केट में लगभग हर हरी सब्जी के दाम बढ़ गए हैं। मौजूदा कीमतों और उनमें हुई बढ़ोतरी की स्थिति इस प्रकार है:

  • अदरक (पुराना): 280 रुपये प्रति किलो (सीधा 80 रुपये का उछाल)

  • भिंडी: 120 से 130 रुपये प्रति किलो (20 रुपये महंगी)

  • फूल गोभी: 100 रुपये प्रति किलो (10 से 20 रुपये की तेजी)

  • शिमला मिर्च: 90 रुपये प्रति किलो (20 रुपये की बढ़ोतरी)

  • प्याज: 80 रुपये प्रति किलो (10 रुपये महंगा)

  • दूधी (लौकी): 80 रुपये प्रति किलो (10 रुपये महंगी)

  • नींबू: 12 से 15 रुपये का एक पीस (प्रति पीस 5 रुपये महंगा)

सर्दियों से पहले राहत के आसार कम

स्थानीय दुकानदारों और सब्जी विक्रेताओं का स्पष्ट कहना है कि कुछ हफ्तों तक इन बढ़ी हुई कीमतों से राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। जब ठंड का मौसम पूरी तरह से शुरू हो जाएगा और नई फसलों की आवक मंडियों में बढ़ेगी, तभी सब्जियों के दामों में नरमी आएगी।

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, जब तक मंडियों में नई फसल की आवक बेहतर स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक मौसमी या स्थानीय रूप से ज्यादा उपलब्ध सब्जियों का विकल्प चुनना ही रसोई का बजट संभालने का सबसे व्यावहारिक तरीका है।